बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Wednesday, 18 September 2019

अभावों का भाव



रिश्तों की डोर वो क्या जाने
जिसने बिखरे रिश्तों को नही देखा
यारों का शोर वो क्या जाने
जिसने सूनी शामों को नही देखा
नही देखी हो जिसने रातें जागकर
वो दीदार सुबह का क्या जाने
क्या जाने वो जश्न जीत का
कभी हार को जिसने नही देखा
नही देखा जिसने माँ का आँचल
फटकार पिता की नही देखा
क्या होते हैं माँ-बाप वो जाने
जिसने हाथ सिर पर इनका नही देखा
नही देखे जिसने खेल खिलौने
बचपन का मोल वही जाने
एक रोटी का मोल वो क्या जाने
कभी खाली थाली को जिसने नही देखा
अभावों के भाव वो क्या जाने
अभावों को जिसने कभी नही देखा
हर भाव जीवन का वही जाने
अभाव को जिसने कभी है देखा
#आँचल 

Tuesday, 17 September 2019

कोटिक नमन नारायणी



विष्णु प्रिया हे चंचला
भुवनेश्वरी हे हिरण्मयी

वसुधारिणी हे पद्मिनी
स्वधा,सुधा,स्वाहा हो तुम
वाची,शुचि,श्रद्धा हो तुम
तुम ही तो प्रेम-प्रकाश स्रोत
माँ प्रकृति का स्वरूप तुम

वसुप्रदा हे चतुर्भुजा
करुणामयी हे यशदायिनी

कामाक्षी हे पद्मासिनी
सुरभि,विधि,क्षमा हो तुम
विद्या,विधा,वसुधा हो तुम
तुम ही तो शृंगार माँ
और दुर्जनो का संघार तुम

उदधि सुता हे अंबुजा
भृगु नंदिनी हे अंबिका

अन्नपूर्णा हे श्री,मोहिनी
रंग,राग,धर्म,ममता हो तुम
परम पुरुष की क्षमता हो तुम
कोटिक नमन नारायणी
कमल नयन की कमला हो तुम
#आँचल


सफ़र-ए-ज़िंदगी



सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कभी हँसना कभी रोना
कभी रोते रोते हँसना सिखाती है
उड़ जाऊँ ऊँचा और नापूँ इस नभ को
ऐसे ख्वाबों को सजाना सिखाती है
तू ही उड़ाती है तू ही गिराती है
गिरकर फिर उड़ना भी तू ही सिखाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कुछ खोकर कुछ पाना
मुरझाकर खिल जाना सिखाती है
कभी टूटना,बिखरना
बिखर कर खो जाना सिखाती है
खोकर भी चमकना
और सबको चमकाना सिखाती है
सफ़र -ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कभी चलना कभी रुकना
पर हार कर ना झुकना सिखाती है
जीना कभी मरना
कभी मर कर भी अपनो के लिए जीना सिखाती है
पथरीले राहों पर डगमगाना
और सँभलना सिखाती है
संग काँटों के भी
गुलाब सा महकना सिखाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
शायद इसीलिए तू संघर्ष कहलाती है
और इन्हीं संघर्षों में
लाखों खुशियाँ दे जाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
#आँचल

Friday, 6 September 2019

भजो रे मन राधे राधे



बिरज गली मच गया शोर
भजो रे मन राधे राधे -2
भजो रे मन राधे श्री राधे श्री राधे -2
बिरज गली मच गया  शोर.......

देखो कीर्ति के आँगन
किशोरी जी पधारी
सोहर गाओ रे सखी
बड़ी मंगल घड़ी आयी
और बधाई का पीट के ढोल
भजो रे मन राधे राधे

बिरज गली मच गया शोर.......

चंचला के नयन
सखी कजरा सजा दे
है वृषभानु दुलारी
सखी झूला झुला दे
और अरबी लगाकर भोग
भजो रे मन राधे राधे

बिरज गली मच गया शोर.......

#आँचल


Thursday, 5 September 2019

गुरु की महिमा



बनूँ याचक जो साहिल सा
महासागर तू बनता है
तू देकर ज्ञान रत्नों सा
मेरे भंडार भरता है
कभी पत्थर भी तू दे दे
तो वो शिवलिंग कहलाए
बहे तेरे ज्ञान की सरिता
तो शालिग्राम दे जाए

हरे अंधियार जो मन का
तू उस दिनकर के जैसा
तपा कुंदन बना दे जो
तू उस अग्नि के जैसा है
गुरु महिमा से भारत पर
अर्जुन,मौर्य मिल जायें
तेरी कृपा हो तो हम भी
विवेकानंद हो जायें

समाज निर्माणकर्ता हे
नमन कोटिशः तुझे कर दूँ
गुरु वंदन सा हो जाए
दो पंक्ति एसी मैं लिख दूँ
तुझे कह दूँ जो मैं जगदीश
हरी का मान बढ़ जाए
तेरे चरणों में झुक  जाऊँ
मुझे भगवान मिल जायें

#आँचल

Saturday, 31 August 2019

मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो

कोई यदि पूछे कि मृत्यु क्या है तो हम  कहेंगे जीवन का अंत है मृत्यु। जीवन सुंदर है तो मृत्यु भयंकर है,जीवन दयालु है तो मृत्यु क्रूर है। पर क्या वास्तव में जीवन जैसी सुंदर रचना के रचनाकार ऐसी  मन को व्यथित करने वाली रचना रच सकते हैं या ये केवल हमारा भ्रम है। चलिए आज दृष्टिकोण बदल कर देखते हैं कि सत्य में मृत्यु किसी कथा का अंत है या नव गाथा का आरंभ,क्रूर है या इतनी नम्र कि हमारे संघर्षों से द्रवित हो मुक्ति दे दे।
हम जानेंगे कि मृत्यु वो मोहिनी है जिसके आगे कोई योगी या निर्मोही भी मन हार जाए । वो सखी है जो हमारे दु:ख-सुख हर कर मात्र सुकून दे। वो माता है जिसकी गोद में आँख बंद करो तो समस्त चिंताओं  और थकान का अंत हो जाता है और जब आँख खुले तो एक नया जीवन स्वागत को खड़ा होता है।
अर्थात अगर हमारा तन दीपक है तो आत्मा दीपशिखा और मृत्यु वो सूत्रधार जो हमे एक अध्याय से दूसरे की ओर ले जाती है।
तात्पर्य यह है कि भेद ईश्वर की रचना में नहीं  हमारी दृष्टिकोण में है।और जो इसे जान लेता है फिर उसे मृत्यु का भय कैसा?
बस इसी दृष्टिकोण के साथ आज  मृत्यु के सुंदर स्वरूप के वर्णन का कुछ इस प्रकार प्रयास किया है -


हे कालसुता हे मुक्ति माता
हे परम सुंदरी हे सत रुपा
अमर अटल अजया हो तुम
तुम परम शांति धवल जया हो
है अंत नहीं  पर्याय तुम्हारा
तुम नव अध्याय की द्योतक हो
हे दीपशिखा की सूत्रधार
मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो

हे विश्वमोहिनी हे जीव प्रिया
हे पतित पावनी हे सदया
तुम मोही-निर्मोही सब को मोह कर
माया पाश से मुक्ति देती हो
चित-परिचित का बंध छुड़ा
उस चित् से चित् को मिलाती हो
हे दीपशिखा की सूत्रधार
मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो

हे चित् धरणी हे मंगल,करुणा
हे परम हठी हे श्वेत प्रभा
दु:ख,सुख,चिंता की चिता जलाकर
परमानंद का दान दे देती हो
यह जीवन यदि संघर्ष है तो
मृत्युलोक की स्वामिनी तुम संधि अवतार ले आती हो
हे दीपशिखा की सूत्रधार
मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो

#आँचल



हार्दिक आभार सादर नमन 

Friday, 2 August 2019

मैं हरी हो जाऊँ



बिन साज कान्हा धुन छेड़े 
बिन झांझर पग लेवे फेरे
मोहे अधर मुरलिया
सोहे मोर मुकुटिया
सूरतिया पर जाऊँ बलिहारी
प्रीत के सुख गीत पर
मयूरा संग रीझ कर
मैं श्याम रिझाऊँ
मैं श्याम रिझाऊँ
हास ठिठोली सखीयन की ना भाए
गुण गावत टोली हरी की लुभाए
छोड़ के सुख छैया
तोड़ रीत पैजनिया
जोगनिया चूनर रंग डाली
नाम प्रीत का जपकर
सम ज्योति सी जलकर
मैं अलख जगाऊँ
मैं अलख जगाऊँ
हरी प्रेम का गुड़ मन चाखे
रोम रोम रंजन हुआ लागे
लगी सागर हरी अँखीयाँ
मन लगाए डुबकियां
हर डुबकी अर्पण गुण दोष कर डाली
तब लोक लाज को तज कर
समर्पण की चोटी चढ़कर
मैं हरी हो जाऊँ
मैं हरी हो जाऊँ
#आँचल