रिश्तों की डोर वो क्या जाने
जिसने बिखरे रिश्तों को नही देखा
यारों का शोर वो क्या जाने
जिसने सूनी शामों को नही देखा
नही देखी हो जिसने रातें जागकर
वो दीदार सुबह का क्या जाने
क्या जाने वो जश्न जीत का
कभी हार को जिसने नही देखा
नही देखा जिसने माँ का आँचल
फटकार पिता की नही देखा
क्या होते हैं माँ-बाप वो जाने
जिसने हाथ सिर पर इनका नही देखा
नही देखे जिसने खेल खिलौने
बचपन का मोल वही जाने
एक रोटी का मोल वो क्या जाने
कभी खाली थाली को जिसने नही देखा
अभावों के भाव वो क्या जाने
अभावों को जिसने कभी नही देखा
हर भाव जीवन का वही जाने
अभाव को जिसने कभी है देखा
#आँचल
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कभी हँसना कभी रोना
कभी रोते रोते हँसना सिखाती है
उड़ जाऊँ ऊँचा और नापूँ इस नभ को
ऐसे ख्वाबों को सजाना सिखाती है
तू ही उड़ाती है तू ही गिराती है
गिरकर फिर उड़ना भी तू ही सिखाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कुछ खोकर कुछ पाना
मुरझाकर खिल जाना सिखाती है
कभी टूटना,बिखरना
बिखर कर खो जाना सिखाती है
खोकर भी चमकना
और सबको चमकाना सिखाती है
सफ़र -ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कभी चलना कभी रुकना
पर हार कर ना झुकना सिखाती है
जीना कभी मरना
कभी मर कर भी अपनो के लिए जीना सिखाती है
पथरीले राहों पर डगमगाना
और सँभलना सिखाती है
संग काँटों के भी
गुलाब सा महकना सिखाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
शायद इसीलिए तू संघर्ष कहलाती है
और इन्हीं संघर्षों में
लाखों खुशियाँ दे जाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
#आँचल
बनूँ याचक जो साहिल सा
महासागर तू बनता है
तू देकर ज्ञान रत्नों सा
मेरे भंडार भरता है
कभी पत्थर भी तू दे दे
तो वो शिवलिंग कहलाए
बहे तेरे ज्ञान की सरिता
तो शालिग्राम दे जाए
हरे अंधियार जो मन का
तू उस दिनकर के जैसा
तपा कुंदन बना दे जो
तू उस अग्नि के जैसा है
गुरु महिमा से भारत पर
अर्जुन,मौर्य मिल जायें
तेरी कृपा हो तो हम भी
विवेकानंद हो जायें
समाज निर्माणकर्ता हे
नमन कोटिशः तुझे कर दूँ
गुरु वंदन सा हो जाए
दो पंक्ति एसी मैं लिख दूँ
तुझे कह दूँ जो मैं जगदीश
हरी का मान बढ़ जाए
तेरे चरणों में झुक जाऊँ
मुझे भगवान मिल जायें
कोई यदि पूछे कि मृत्यु क्या है तो हम कहेंगे जीवन का अंत है मृत्यु। जीवन सुंदर है तो मृत्यु भयंकर है,जीवन दयालु है तो मृत्यु क्रूर है। पर क्या वास्तव में जीवन जैसी सुंदर रचना के रचनाकार ऐसी मन को व्यथित करने वाली रचना रच सकते हैं या ये केवल हमारा भ्रम है। चलिए आज दृष्टिकोण बदल कर देखते हैं कि सत्य में मृत्यु किसी कथा का अंत है या नव गाथा का आरंभ,क्रूर है या इतनी नम्र कि हमारे संघर्षों से द्रवित हो मुक्ति दे दे।
हम जानेंगे कि मृत्यु वो मोहिनी है जिसके आगे कोई योगी या निर्मोही भी मन हार जाए । वो सखी है जो हमारे दु:ख-सुख हर कर मात्र सुकून दे। वो माता है जिसकी गोद में आँख बंद करो तो समस्त चिंताओं और थकान का अंत हो जाता है और जब आँख खुले तो एक नया जीवन स्वागत को खड़ा होता है।
अर्थात अगर हमारा तन दीपक है तो आत्मा दीपशिखा और मृत्यु वो सूत्रधार जो हमे एक अध्याय से दूसरे की ओर ले जाती है।
तात्पर्य यह है कि भेद ईश्वर की रचना में नहीं हमारी दृष्टिकोण में है।और जो इसे जान लेता है फिर उसे मृत्यु का भय कैसा?
बस इसी दृष्टिकोण के साथ आज मृत्यु के सुंदर स्वरूप के वर्णन का कुछ इस प्रकार प्रयास किया है -
हे कालसुता हे मुक्ति माता
हे परम सुंदरी हे सत रुपा
अमर अटल अजया हो तुम
तुम परम शांति धवल जया हो
है अंत नहीं पर्याय तुम्हारा
तुम नव अध्याय की द्योतक हो
हे दीपशिखा की सूत्रधार
मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो
हे विश्वमोहिनी हे जीव प्रिया
हे पतित पावनी हे सदया
तुम मोही-निर्मोही सब को मोह कर
माया पाश से मुक्ति देती हो
चित-परिचित का बंध छुड़ा
उस चित् से चित् को मिलाती हो
हे दीपशिखा की सूत्रधार
मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो
हे चित् धरणी हे मंगल,करुणा
हे परम हठी हे श्वेत प्रभा
दु:ख,सुख,चिंता की चिता जलाकर
परमानंद का दान दे देती हो
यह जीवन यदि संघर्ष है तो
मृत्युलोक की स्वामिनी तुम संधि अवतार ले आती हो
हे दीपशिखा की सूत्रधार
मृत्यु तुम स्वयं अप्सरा हो
बिन झांझर पग लेवे फेरे
मोहे अधर मुरलिया
सोहे मोर मुकुटिया
सूरतिया पर जाऊँ बलिहारी
प्रीत के सुख गीत पर
मयूरा संग रीझ कर
मैं श्याम रिझाऊँ
मैं श्याम रिझाऊँ
हास ठिठोली सखीयन की ना भाए
गुण गावत टोली हरी की लुभाए
छोड़ के सुख छैया
तोड़ रीत पैजनिया
जोगनिया चूनर रंग डाली
नाम प्रीत का जपकर
सम ज्योति सी जलकर
मैं अलख जगाऊँ
मैं अलख जगाऊँ
हरी प्रेम का गुड़ मन चाखे
रोम रोम रंजन हुआ लागे
लगी सागर हरी अँखीयाँ
मन लगाए डुबकियां
हर डुबकी अर्पण गुण दोष कर डाली
तब लोक लाज को तज कर
समर्पण की चोटी चढ़कर
मैं हरी हो जाऊँ
मैं हरी हो जाऊँ