कुछ बातें बोली नही जाती तो वो अनकही हो जाती हैं उन अनकही बातों को इन पन्नों पर उतारा है।

Saturday, 19 May 2018

जीवन आधार पेड़

सर पे सूरज चढ़ चुका है
ताप मौसम का बढ़ चुका है
तर बतर तन गर्मी से
ना कटता तरु अब कुल्हाड़ी से
अब थोड़ा सा विश्राम करूँगा
पेड़ के नीचे एक नींद भरूँगा
ज्यों बैठा मै छाँव तले
आँखों में गहरी थकान भरे
कोई क्रंदन कानों में गूँज उठा
और लगा समा नाराज़ हुआ
चू चू करती जैसे कोई
नन्ही चिड़िया रोती हो
बेघर होने के डर से
रहम रहम चिल्लाती हो
शोर मचाती जैसे कोई
वानर टोली घबराई हो
इधर उधर से कूद फाँदकर
मदद की आस लगायी हो
सरपट सरपट वो भाग रही
गिलहरी भी सहमी सी लगती है
दानव दानव की गाली देकर
जाने किधर भटकती है
फुफकारता निकला फ़िर एक भुजंग
जैसे नींद में पड़ा गया हो भंग
अब तो मै भी सकपका गया
देखकर सब कुछ घबरा गया
तभी तेज़ हवा का झोंका आया
आलम बदला सा मैंने पाया
अब कहीं नही हरियाली है
पेड़ों से दुनिया खाली है
ये कैसा धरा ने रूप धरा
जीवन धरती पर घुटन भरा
नदियाँ भी जैसे प्यासी हो
सब साँसें गिनती में चलती हो
कहीं बंजर भूमि है तप रही
कहीं बाड़ में दुनिया डूब रही
कोने कोने में अकाल पड़ा
हर घर मृत्यु का काल खड़ा
देख भय से मन ये काँप गया
मै कैसे यहाँ तक पहुँच गया
क्या धरती को किसी ने श्राप दिया
ये किसने सुकून का क़त्ल किया
तभी फ़िर से जोर की चली हवा
उसी पेड़ की छाँव में मैं फ़िर से खड़ा
यकायक दिल को जो सुकून मिला
खुशी में पेड़ को चूम लिया
तभी भावविभोर हो पेड़ भी बोला
उसी ने किया ये सब कुछ इस राज़ को खोला
ये चिड़िया,वानर,भुजंग,गिलहरी
सब पनाह लेती मुझमें हर पहरी
जाने कितने जीवों  का घर बार हूँ मै
तेरी साँसों का भी आधार हूँ मै
जो दृश्य भयंकर देखा है तुमने
बिन मेरे वही मंजर पाओगे
जो काटोगे पेड़ों को ऐसे
तो जीवन को कैसे पाओगे
यही बताने तुझको समझाने
कुदरत ने था सब स्वाँग रचा
बिन पेड़ों के बिन वृक्षों के
तू कैसे लेगा साँस बता
सुनकर मै था स्तब्ध खड़ा
पर मजबूर मै भी अब बोल पड़ा
तुम से ही मेरी रोजी रोटी
तुम से ही पूँजी होती है
जो ना काटूँगा एक दिन तुझको
तो बिटिया भूखी मेरी भी सोती है
और मै ही एक ज़िम्मेदार नही
कसूर बाकी सबका भी कम तो नही
मैं अकेले कैसे जीवन को बचाऊँगा
बिन काटे कैसे घर को जाऊँगा
बोला पेड़ तेरी बात है सही
पर मुश्किल का तेरे है हल भी यही
जो एक पेड़ को काटो तो दो पहले ही लगा देना
एक के बदले दो देकर धरती पर जीवन बचा लेना
तभी गर्म हवा का झोंका आया
नींद से उसने मुझे जगाया
वृक्षों से धरा ने जीवन पाया
ख्वाब ने मुझे ये राज़ बताया
अब पहले दो पेड़ लगाऊँगा
तभी काटने का हक़ भी पाऊँगा

                                    #आँचल 

18 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-05-2018) को "वो ही अधिक अमीर" (चर्चा अंक-2976) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय शास्त्री जी
      सादर नमन
      शुभ दिवस

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक २१ मई २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय श्वेता दीदी
      हम अवश्य आयेंगे
      सादर नमन
      शुभ दिवस 🙇

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  3. आंचल लाजवाब आपने एक सपने के माध्यम से भविष्य और वर्तमान का एक सुंदर संदेशात्मक ताना बाना बुन कर अप्रतिम काव्य का सृजन किया।
    बहुत ही सुंदर और सार्थक।

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    1. बखूबी समझती हैं आप हमारी रचना को कुसुम दीदी
      यही कोशिश थी हमारी की उस भयंकर भविष्य की झलक अपनी रचना के ज़रिये दिखा सकूँ जिसकी ओर वर्तमान में हमारे कदम बढ़ रहे हैं
      आपको पसंद आयी लिखना सार्थक हुआ
      हार्दिक आभार सादर नमन 🙇

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  4. Replies
    1. thank you so much Sunil bhaiya 🙇

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  5. प्रिय आँचल सीधे सादे शब्दों में अत्यंत गंभीर बात कह गईं आप.... पिछले दो तीन दिनों में पेड़ के चित्र से संबंधित कई रचनाएँ पढ़ीं। इतना कह सकती हूँ कि इस रचना के माध्यम से आपने जो चित्र खींच दिया वह आपकी रचना को दूसरों से अलग एवं विशेष बनाता है। बहुत सा स्नेह आपके लिए....

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    1. आदरणीया मीना जी प्रत्युत्तर में देरी के लिए क्षमा
      हमने तो बस कोशिश की थी अपने भावों को शब्दों में पिरोने की और आपने हमारी कोशिश का इतना मान बढ़ा दिया हार्दिक आभार ऐसे ही अपना स्नेह आशीष बनाए रखिएगा
      सुप्रभात शुभ दिवस 🙇

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  6. निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' २१ मई २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीय गोपेश मोहन जैसवाल जी से करवाने जा रहा है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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    1. हमारी रचना को चुनने के लिए हार्दिक आभार 🙇

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  7. जो एक पेड़ को काटो तो दो पहले ही लगा देना
    एक के बदले दो देकर धरती पर जीवन बचा लेना
    बहुत सुन्दर, सार्थक एवं लाजवाब....
    वाह!!!

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    1. हार्दिक आभार आदरणीया सुधा जी
      जितनी तेज़ी से पेड़ से धरती खाली हो रही है उतनी ही तेज़ी से धरती फ़िर हरी भरी हो जाए इसी इच्छा को लेकर ये संदेश दिया है हमने आपको पसंद आयी हार्दिक आभार सुप्रभात शुभ दिवस 🙇

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  8. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति :)
    बहुत दिनों बाद आना हुआ ब्लॉग पर प्रणाम स्वीकार करें

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    1. हार्दिक आभार आपका आदरणीय
      हमारे blog पर आपका पुनः स्वागत है
      सादर नमन शुभ दिवस

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  9. सुंदर रचना.....लिखते रहें।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय
      blog पर आपका स्वागत है
      सादर नमन शुभ दिवस

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