बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Wednesday, 9 October 2019

तुम कहाँ गए बापू



तुम कहाँ गए बापू
देश तेरा भटक रहा -2
ये बाढ़ नही,है आँसु
जो नभ से छलक रहा -2

आज़ादी हुई कितनी पुरानी
पर भारत की वही कहानी -2
रोता ठगा हुआ किसान
सूली पर लटक रहा
तुम कहाँ गए बापू....

कितने सितम सहे तुमने
कितने लाल शहीद हुए -2
इस वतन पे चोट करी उसने
जो सत्ता के मुरीद हुए
लिए सांस्कृतियों की थाती
सब जग में पहुँच रही ख्याति
हर तर्ज पर मुल्क गतिमान
धर्म पर अटक रहा
तुम कहाँ गए बापू....

सत्य,अहिंसा वृद्ध हो गए
झूठ और हिंसा धर्म हुए -2
सत्याग्रह भी कहीं खो गए
लिंचिंग में कितने प्राण गए
वो स्वावलम्बी चरखा तेरा
छूटा सूत का स्वदेशी फेरा
सिर ढके विदेशी परिधान
देश तेरा बहक रहा
तुम कहाँ गए बापू....

रिश्वत की दर पर महल खड़े
और पेट गरीब के रोज़ कटे -2
तड़पे भूख से कहीं कोई लाल
तेरी याद में सिसक रहा
तुम कहाँ गए बापू....

तुम कहाँ गए बापू
देश तेरा भटक रहा
ये बाढ़ नही,है आँसु
जो नभ से छलक रहा -2

तुम कहाँ गए बापू....

#आँचल 

Tuesday, 1 October 2019

जो पंख लगे तो उड़ जाऊँ

आज मेरी एक प्यारी सी दोस्त ने उत्साहवर्धन हेतु मुझसे अंग्रेजी का एक वाक्य कहा ' Fly bird you are born with wings' इसे पढ़कर हम उसे आभार व्यक्त करने जा ही रहे थे कि यकायक मेरे मन में एक भाव उठा। अब ये भाव कितना उचित है और कितना अनुचित ये आप गुणीजन बेहतर समझेंगे।



जो पंख लगे तो उड़ जाऊँ
दंभी अंबर के आलिंगन को
जो बढ़ूँ तो अंतर बढ़ाता है
प्रभुता को अपने इतराता है
क्यू छोड़ जाऊँ इस धरती को
जो गिरते को भी अपनाती हैं
ज़ुल्मी हो या धर्मी
सबको अंतर में अपने बसाती है
चलो कहती हो तो उड़ जाऊँगी
एक नही कई बार उड़ूँगी
बस अंबर को इतना सिखलाने
है महान वही जो झुकना जाने
जो जाने बिन माँगे बस देना
प्रेम सुधा में सबको भिगोना
तज मान,ईश हो जाना
फिर भी सम धरा
भाव सेवा का रखना
#आँचल

Wednesday, 18 September 2019

अभावों का भाव



रिश्तों की डोर वो क्या जाने
जिसने बिखरे रिश्तों को नही देखा
यारों का शोर वो क्या जाने
जिसने सूनी शामों को नही देखा
नही देखी हो जिसने रातें जागकर
वो दीदार सुबह का क्या जाने
क्या जाने वो जश्न जीत का
कभी हार को जिसने नही देखा
नही देखा जिसने माँ का आँचल
फटकार पिता की नही देखा
क्या होते हैं माँ-बाप वो जाने
जिसने हाथ सिर पर इनका नही देखा
नही देखे जिसने खेल खिलौने
बचपन का मोल वही जाने
एक रोटी का मोल वो क्या जाने
कभी खाली थाली को जिसने नही देखा
अभावों के भाव वो क्या जाने
अभावों को जिसने कभी नही देखा
हर भाव जीवन का वही जाने
अभाव को जिसने कभी है देखा
#आँचल 

Tuesday, 17 September 2019

कोटिक नमन नारायणी



विष्णु प्रिया हे चंचला
भुवनेश्वरी हे हिरण्मयी

वसुधारिणी हे पद्मिनी
स्वधा,सुधा,स्वाहा हो तुम
वाची,शुचि,श्रद्धा हो तुम
तुम ही तो प्रेम-प्रकाश स्रोत
माँ प्रकृति का स्वरूप तुम

वसुप्रदा हे चतुर्भुजा
करुणामयी हे यशदायिनी

कामाक्षी हे पद्मासिनी
सुरभि,विधि,क्षमा हो तुम
विद्या,विधा,वसुधा हो तुम
तुम ही तो शृंगार माँ
और दुर्जनो का संघार तुम

उदधि सुता हे अंबुजा
भृगु नंदिनी हे अंबिका

अन्नपूर्णा हे श्री,मोहिनी
रंग,राग,धर्म,ममता हो तुम
परम पुरुष की क्षमता हो तुम
कोटिक नमन नारायणी
कमल नयन की कमला हो तुम
#आँचल


सफ़र-ए-ज़िंदगी



सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कभी हँसना कभी रोना
कभी रोते रोते हँसना सिखाती है
उड़ जाऊँ ऊँचा और नापूँ इस नभ को
ऐसे ख्वाबों को सजाना सिखाती है
तू ही उड़ाती है तू ही गिराती है
गिरकर फिर उड़ना भी तू ही सिखाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कुछ खोकर कुछ पाना
मुरझाकर खिल जाना सिखाती है
कभी टूटना,बिखरना
बिखर कर खो जाना सिखाती है
खोकर भी चमकना
और सबको चमकाना सिखाती है
सफ़र -ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
कभी चलना कभी रुकना
पर हार कर ना झुकना सिखाती है
जीना कभी मरना
कभी मर कर भी अपनो के लिए जीना सिखाती है
पथरीले राहों पर डगमगाना
और सँभलना सिखाती है
संग काँटों के भी
गुलाब सा महकना सिखाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
शायद इसीलिए तू संघर्ष कहलाती है
और इन्हीं संघर्षों में
लाखों खुशियाँ दे जाती है
सफ़र-ए-ज़िंदगी
तू क्या-क्या सिखाती है
#आँचल

Friday, 6 September 2019

भजो रे मन राधे राधे



बिरज गली मच गया शोर
भजो रे मन राधे राधे -2
भजो रे मन राधे श्री राधे श्री राधे -2
बिरज गली मच गया  शोर.......

देखो कीर्ति के आँगन
किशोरी जी पधारी
सोहर गाओ रे सखी
बड़ी मंगल घड़ी आयी
और बधाई का पीट के ढोल
भजो रे मन राधे राधे

बिरज गली मच गया शोर.......

चंचला के नयन
सखी कजरा सजा दे
है वृषभानु दुलारी
सखी झूला झुला दे
और अरबी लगाकर भोग
भजो रे मन राधे राधे

बिरज गली मच गया शोर.......

#आँचल


Thursday, 5 September 2019

गुरु की महिमा



बनूँ याचक जो साहिल सा
महासागर तू बनता है
तू देकर ज्ञान रत्नों सा
मेरे भंडार भरता है
कभी पत्थर भी तू दे दे
तो वो शिवलिंग कहलाए
बहे तेरे ज्ञान की सरिता
तो शालिग्राम दे जाए

हरे अंधियार जो मन का
तू उस दिनकर के जैसा
तपा कुंदन बना दे जो
तू उस अग्नि के जैसा है
गुरु महिमा से भारत पर
अर्जुन,मौर्य मिल जायें
तेरी कृपा हो तो हम भी
विवेकानंद हो जायें

समाज निर्माणकर्ता हे
नमन कोटिशः तुझे कर दूँ
गुरु वंदन सा हो जाए
दो पंक्ति एसी मैं लिख दूँ
तुझे कह दूँ जो मैं जगदीश
हरी का मान बढ़ जाए
तेरे चरणों में झुक  जाऊँ
मुझे भगवान मिल जायें

#आँचल