जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर
तो अवध की गलियों में आ जाना
और चाहते हो गर मुस्कुराना तो
दिल -ए-लखनऊ से दिल लगाना।
महका खज़ाना,है यही लज्जतों का ठिकाना,
कभी खस्ता,कचौड़ी तो कभी कबाबी उल्फताना।
डालोगे शामियाना,यही ज़मीन लिखाओगे,
राम आसरे की मलाई गिलौरी और कहाँ पाओगे?
जलते नही चराग यहाँ,रोशन हुआ करते हैं,
अनपड़ भी फब्तियो से लाजवाब किया करते हैं,
ये शहर-ए-अदब है जनाब,बेगपाती इसकी जुबां है,
बातों बातों में यहाँ लोग नज़्में पढ़ा करते हैं।
निगहबान बंदिशों के आसमां बाँधने का दम रखते हैं,
ताल पर तोड़ बंदिश चपल पाँव से बंदगी करते हैं,
शेर -ओ-अदब की ये गलियाँ ,यहाँ सभी फ़नकार हैं,
आप मिसरे कहने की जुर्रत करिए,गिरह हम बाँधते हैं।
रगें रंगीन हैं इसकी,यूँ रोशन बाज़ार हैं,
चौक की कशीदाकारी,अमीनाबाद गुलज़ार है।
दरों-दीवार से इसके बयाँ होता इतिहास है,
लखन की ये ज़मीन,विरासतों पर नवाबी छाप है।
यहाँ तलवार-ए-साज़ पर क्रांति की पाजेब बजती है,
मौलाना - पंडित की याराना महफ़िल जमती है,
यहाँ दिलों में मोहब्बत,मुरव्वत बेशुमार रखते हैं,
यूँ हीं नही जुबां पे पहले आप,पहले आप रखते हैं।
#आँचल






