बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Tuesday, 19 March 2019

मै नारायण की दासी


मै नारायण की दासी मै हरी दर्शन की प्यासी
मोहे पल पल तेरी याद सतावे,
मन व्याकुल तेरे गीत ही गावे,
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ

मै नारायण की दासी मै हरी चरणन को तरसी
तेरी चरण रज निज  माथे लगाऊँ,
नित चरणों की सेवा मै पाऊँ,
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ

मै नारायण की दासी मेरे हरी कण कण के वासी
मम हृदय में वास करो प्रभु,
पूर्ण समर्पण स्वीकार करो प्रभु,
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
                                                  -आँचल

नंदलाला मोरे गोपाला मोरे



नन्द्लाला मोरे गोपाला मोरे,
दर्शन को तेरे नैन प्याला भये

गंगा पावन नदी कहलाने लगी,
चरणों को तेरे जो छूके बही

एक नारी बड़ी दुखियारी पड़ी,
कृपा सिंधु कृपा अहील्या को मिली

सुकुमार एक बालक तेरी खोज करें,
दर्शन जो मिले ध्रुव तारा भये

अठ्केली करें वात्सल्य भरे,
ममता को प्रेम गोपीयन से लिये

नन्द्लाला मोरे गोपाला मोरे,
दर्शन को तेरे नैन प्याला भये।

                                                  -आँचल 

सुन उद्धव अभिमानी



हम माने है  प्रेम ज्ञान को सुन उद्धव अभिमानी,
जो जाने है कृष्ण प्रेम को सो ही है  बड़ ज्ञानी

तोरो ज्ञान से छूटत होंगे मोह बंधन से प्राणी,
प्रेम ज्ञान से बंध जाते हैं मोर मुकुट स्वामी

कहत प्रेम संगिनी मोहन की  सुन वेदों के ज्ञाता
प्रेम योग ही परम योग ये कहते विश्व विधाता

जब  प्रेम रंग में  रंग जाते  तब और रंग ना भाते
हम पीर विरह की सह जाते हमे और योग ना आते

तोरो ज्ञान अधुरो उद्धव तू प्रीत को नाही माने
राधा-गिरधर के अमर प्रेम को अबतक नाही जाने

ढाई  अक्षर को प्रेम ये भारी तुम्हरे वेद पुराणों  पे
तुम मानो ये योग हमारी जो ना है वेद पुराणों  में
       
                                                     -आँचल 

एक जोगन बनी एक दिवानी बनी



एक जोगन बनी एक दिवानी बनी,
मदन मनोहर को चाहने लगी।

एक गिरधर गिरधर जपने लगी,
एक कान्हा कान्हा बुलाने लगी

एक वीणा की धुन पे गाने लगी,
एक बंसी की धुन पे थिरकने लगी

एक जग की रीत ठुकराने लगी,
एक प्रेम की रीत निभाने लगी

एक संतों की वाणी कहने लगी,
एक संतों की वाणी बनने लगी

एक अश्रु प्रीत के बहाने लगी,
एक अश्रु बिछोह के छिपाने लगी

एक श्याम दरस को तरसने लगी,
एक कृष्ण विरह को सहने लगी

महलों में दोनों पली बड़ी श्याम रंग में रंगने लगीं
एक मीरा भयी एक राधा भयी
मदन मनोहर को चाहने लगी

एक जोगन बनी एक दिवानी बनी,
मदन मनोहर को चाहने लगी
                                                -आँचल 

विरह काहे बनाई



प्रश्न करूँ तुम से एक बिहारी
विरह काहे बनाई,रे कान्हा विरह काहे बनाई?

लोग कहे सिया बड़ी दुखियारी,
त्यागी गयी स्वामी से नारी,
विरह काहे बनाई रे कान्हा विरह काहे बनाई?

ताने कसे राधा पे बिचारी,
छोड़ गयो जो मदन मुरारी,
विरह काहे बनाई रे कान्हा विरह काहे बनाई?

अपमान मिला मीरा को भारी,
डूबी जो तुझ में गिरधारी,
विरह काहे बनाई रे कान्हा विरह काहे बनाई?

प्रीत लगी तुम संग जो बिहारी,
पीर विरह की लागे प्यारी।।

विरह काहे बनाई रे कान्हा विरह काहे बनाई?
ओ कान्हा विरह काहे बनाई?
                                                        -आँचल
                                                  

रूप मनोहर ऐसो पायो



रूप मनोहर ऐसो पायो,कृष्ण प्रेम रंग मन मोरा रंगायो
कजरारी तोरी नीली अँखीया मन मोरा डूबे दिन रतीया,
मुरली मनोहर ऐसो बजायो,धुन में अपनो सुध को खोवायो
मधुर मधुर तूने मुरली बजायो तीनों  लोक सब तुझमें समायो,
मुस्कान मनोहर ऐसो पायो,चित मोरा तुझमें रम जायो
मंद मंद चितचोर हँसे फिर गोपीयन को तूने  चैन चुरायो,
शब्द मनोहर ऐसो पायो,अपनो मोह में जग को फँसायो
फिर गीता उपदेश सुनाकर मोह बंधन से जग को छुड़ायो,
रूप मनोहर ऐसो पायो कृष्ण प्रेम रंग मन मोरा रंगायो।।
                                                       -आँचल 

Sunday, 10 February 2019

सरस्वती वंदना


पुलकित पल्लव,सुरभित मुकुल,
कुमुद,खग कलरव करत वंदना
सोम,मुकुंदा,शिव,गंग,सविता
पद विमला की करत अर्चना
नृत राग,रागिनी,भू,नभ,उदधि,
कोपल,बाली करे रंजना
हे वाग्देवी हे ज्ञान की सरिता
ललित,निरंजन,शक्ति स्वरूपा
तुम्ही ज्योत्सना करती तम भंजन
हर लो विकार कर दो मन कंचन
ऋद्धि,सिद्धि,सुर,गुण तुम ज्योति
काम,क्रोध मोह,लोभ को हरती
तुम शतरूपा,शारदा,सुवासिनी
पद्माक्षी,मालिनी,सौदामिनी
शुभ,मंगल की तुम माँ द्योतक
पाप,दोष हर लो तुम मोचक
नव उत्थान वर दो वरदायनी
भव बंधन मुक्त करो मोक्षदायनी
ऋतु बसंत सुंदर तिथि पंचम
ओढे पीत चुनरिया खेत लगे दुल्हन
करे नमन तुम्हे धरती का कण कण
स्वीकार करो माँ मेरा भी वंदन
       जय माँ सरस्वती
#आँचल