बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Tuesday, 3 March 2020

भोले भले हो



भोले, भले हो,नादान हो,
बच्चों तुम्ही तो भगवान हो। -2

मन में तुम्हारे कोई मैल नही है,
छल का तुम्हारा खेल नही है,
दिल में तुम्हारे जो अच्छाई है,
कहते उसी को सच्चाई है।
कोमल कली हो,फुलवारी हो,
आशा के तुम सब पुरवाई हो।

भोले,भले हो........

नज़रें तुम्हारी कोई भेद ना जाने,
जग में किसी को गैर ना माने,
पल में जो रूठो तो पल में ही मानो,
बैर ना जानो बस प्रेम ही बाँटो।
लड़कपन की सुंदर परछाई हो,
खुशियों भरी वो अलमारी हो।

भोले,भले हो..........

उलझे सवालों की तुम दास्तान,
जवाबों में ढूंढों नया सा जहाँ,
अंबर में तैरो,सागर में उड़ लो,
ज़मीं पे सितारों की कक्षा लगा लो।
इंद्रधनुष की रंगदानी हो,
नई दुनिया जो रंग दे वो पिचकारी हो।

भोले,भले हो..........

भोले,भले हो,नादन हो,
बच्चों तुम्ही तो भगवान हो।

#आँचल 

Tuesday, 11 February 2020

धूल हूँ जो उड़ चली हूँ



धूल हूँ जो उड़ चली हूँ राह पाने को,
ढूँढ़ती हूँ गली-गली में साँवरे मन को।-2

लक्ष्य को जो विलग हुई हूँ घने तरूवर से,
भटकती जो अटक गयी कांटो की झाड़ी में,
गति के झोंकों से बढ़ूँ,वीरान पाती हूँ,
माटी में जाकर मिलूँ,मैं माटी का कण हूँ।

धूल हूँ जो उड़ ......

क्षुब्ध-सी मैं ढुलक रहीं हूँ,लुब्ध कंकड़ हूँ,
ढल रही हूँ,घिस रही हूँ विकार अंतर के,
अचल से होकर पृथक मैं सूक्ष्म-सा कण हूँ,
माटी में जाकर मिलूँ मैं माटी का कण हूँ।

धूल हूँ जो उड़ ........

शून्य हूँ,निस्पंद हूँ,मैं मधुर स्पंदन हूँ,
अंत का आनंद हूँ,आधार क्रंदन हूँ,
परिणय की वेदि पे बैठी राख होती हूँ,
माटी से जाकर मिलूँ मैं,माटी का कण हूँ।

धूल हूँ जो उड़.........

धूल हूँ जो उड़ चली हूँ राह पाने को,
ढूँढ़ती गली गली में साँवरे मन को।

#आँचल 

Thursday, 30 January 2020

एक रोटी चार टुकड़े


एक रोटी चार टुकड़े बाँटकर खाते रहे,
हम तो अपना पेट यूँ ही काटकर जीते रहे।

ए गुले गुलज़ार तेरी थाल में बोटी सजी,
मांस अपना दे के तेरा पेट पालते रहे।

है सितम का घात दुगना,आग भी ठंडी पड़ी,
ओढ़कर खुद को ही हमने सर्द से है जंग लड़ी।

ताप लो तुम हाथ अपने,कौडे की लपटें उठी,
तेरी ख़िदमत को ही तो झोपड़ी मेरी जली।

आँसुओं में डूबती है बस्तियाँ ईमान की,
जल चुकी हैं पोथियाँ जबसे धर्म की,ज्ञान की।

ए गुले गुलज़ार तेरे सिर पे जो पगड़ी सजी,
दांव पर रख के वतन को सोने की कलगी लगी।

दीन भी क्या दीन जाने? रूह तक गिरवी पड़ी,
साज़िशों की आँधियों में सरज़मीन जिसकी लुटी।

खेलते हो खेल तुम जो तख़्त की गर्दिश है ये,
बिक रही हैं लाशें जो,गफ़लत में हम बैठे नही।

#आँचल 

Friday, 24 January 2020

क्या सोता भारत जाग रहा है?



धधक उठी ज्वाला नभ उर में,
हाहाकार मचा कलरव में,
विपुल समर को घन अब रण में,
उठी चित्कार सुनो मनवन में,
थे तृण हरित,सब शूल हुए हैं,
त्राहि त्राहि कर धूल उड़े है,
पतित हुई अब मानसी गंगा,
सत्य,धर्म का झूठा धंधा,

अरुणा का किसने रूप हरा है?
भोर तिमिर संग खेल रहा है!!-2
क्या सोता भारत जाग रहा है?-2

तुंग हिमालय भी दहला है,
दिल्ली का दिल फिर बहला है,
हुड़दंग बंग में खूब मचा है,
लखनपुरी में भी लोचा है,
दूषित हुई बयार सदन की,
रोषित हुई पुकार रुदन की,
सूर-शौर्य का बिक गया तमगा,
कलम गा रहा झूठ की प्रभुता,

युग का कैसा ये दौर खड़ा है?
जागृति का खूब स्वाँग रचा है!!-2
क्या सोता भारत जाग रहा है?-2

घने धुंध की घनी कृपा है,
नीति का आशय धुंधला है,
धर धरना बैठी गरिमा है,
सिंहासन की सब महिमा है,
ठगी खड़ी कठ पर जनता है,
चूल्हे पर जल रही चिता है,
राजनीति की रोटी सिक गयी,
नेताओं की दाल भी गल गयी,

सब खोकर भी कोई सोता है?
सूर्य पतन का जाग चुका है!!-2
क्या सोता भारत जाग रहा है?-2

#आँचल 

Monday, 6 January 2020

शेर-ओ-अदब का ये शहर



जो ढूँढ़ते हो अदब,तहज़ीब अगर
तो अवध की गलियों में आ जाना
और चाहते हो गर मुस्कुराना तो
दिल -ए-लखनऊ से दिल लगाना।

महका खज़ाना,है यही लज्जतों का ठिकाना,
कभी खस्ता,कचौड़ी तो कभी कबाबी उल्फताना।
डालोगे शामियाना,यही ज़मीन लिखाओगे,
राम आसरे की मलाई गिलौरी और कहाँ पाओगे?

जलते नही चराग यहाँ,रोशन हुआ करते हैं,
अनपड़ भी फब्तियो से लाजवाब किया करते हैं,
ये शहर-ए-अदब है जनाब,बेगपाती इसकी जुबां है,
बातों बातों में यहाँ लोग नज़्में पढ़ा करते हैं।

निगहबान बंदिशों के आसमां बाँधने का दम रखते हैं,
ताल पर तोड़ बंदिश चपल पाँव से बंदगी करते हैं,
शेर -ओ-अदब की ये गलियाँ ,यहाँ सभी फ़नकार हैं,
आप मिसरे कहने की जुर्रत करिए,गिरह हम बाँधते हैं।

रगें रंगीन हैं इसकी,यूँ रोशन बाज़ार हैं,
चौक की कशीदाकारी,अमीनाबाद गुलज़ार है।
दरों-दीवार से इसके बयाँ होता इतिहास है,
लखन की ये ज़मीन,विरासतों पर नवाबी छाप है।

यहाँ तलवार-ए-साज़ पर क्रांति की पाजेब बजती है,
मौलाना - पंडित की याराना महफ़िल जमती है,
यहाँ दिलों में मोहब्बत,मुरव्वत बेशुमार रखते हैं,
यूँ हीं नही जुबां पे पहले आप,पहले आप रखते हैं।

#आँचल 

Tuesday, 17 December 2019

ये क्षण का आक्रोश है


क्या फिर समर उद्घोष है?
ये क्षण का आक्रोश है। -२

हैं लाख सी जल रही 
अधिकारों की पोथियाँ 
और द्रौपदी भस्म हुई 
सिक गयी सियासी रोटियाँ,
जब खो बैठे धृतराष्ट विवेक 
तब मौन हुए पांडव अनेक 
क्या सकल सजगता लोप है?
ये क्षण का बस रोष है।

क्या फिर समर उद्घोष है?
ये क्षण का आक्रोश है।

है लाक्षागृह में लपट उठी,
फिर शकुनि की बिसात बिछी,
पक्षों में दोनों अधर्म खड़ा,
विदुरों का धर्म वनवास गया।
शांति का ना कोई दूत यहाँ,
कुरुक्षेत्र हुआ अंधकूप यहाँ।
क्या राष्ट्रप्रेम का शोर है?
ये क्षण का बस ढोंग है।

क्या फिर समर उद्घोष है?
ये क्षण का आक्रोश है।

हे याज्ञसेनी अब आग धरो,
जागो पांडव,हुंकार भरो,
हो प्रखर मकर की काट बनो,
दिनकर की पंक्ति याद करो,
सिंहासन पर अपना अधिकार करो,
मत सहो,अब रण को कूच करो।
क्या बाकी अब भी कोई क्लेश है?
ये क्षण क्रांति पर ओस है।

क्या फिर समर उद्घोष है?
ये क्षण का आक्रोश है।
ये क्षण का आक्रोश है.......

#आँचल 

अन्नु दीदी की कहानी "ब्रोकेन फोन के तीन रहस्य "

आप सभी आदरणीय जनों को सादर प्रणाम। आज बड़े ही हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही आप सबसे ये साझा करते हुए कि आदरणीया अनीता लागुरी (अन्नु ) दीदी जी की कहानी " ब्रोकेन फोन के तीन रहस्य " Amazon Kindle के pen to publish प्रतियोगिता में शामिल हो गयी है। नीचे दिए गए लिन्क् से आप सब भी दीदी जी की इस पुस्तक को डाउनलोड कर पढ़े और अपनी शुभकामनाएँ और आशीष से दीदी को अनुग्रहीत करें।
https://www.amazon.in/dp/B082R17T6R/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_fKo9DbBXTRP5D

हमने भी कल इस रोचक कहानी का आनंद लिया। इसे पढ़कर जो हमारे विचार थे वो आगे आप सबसे साझा करती हूँ।



शिबु और विभु के ईर्द गिर्द घूमती आदरणीया अनीता दीदी जी द्वारा रचित इस कहानी ' ब्रोकेन फोन के तीन रहस्य ' ने हर भाव,रस को स्वयं में समेटकर पाठकों को निश्चित रूप से हर घटना से जोड़ लिया होगा। जहाँ अपने निजी जीवन की विषम परिस्थितियों से झूझ्ते हुए भी एक अंजान की आगे बढ़कर सहायता करने वाले विभु की नेकी मन को छूती है तो वही एक ब्रोकेन फोन में विभु के लिए छोड़े गए तीन वॉयस मेसेज के ज़रिये विभु का जीवन जीने को मजबूर शिबु  की दरियादिली और भावुकता पाठकों के हृदय में निश्चित ही स्थान बना रही होगी।

जहाँ एक ओर चायवाले चाचा और चाची का शिबु के संग सुंदर नाता अपनत्व के भाव से कहानी को सुखद बना रहा है तो वही ब्रोकेन फोन में पड़े तीनों वॉयस मेसेज कहानी को रोचक बनाते हुए पाठक के मन में जिज्ञासा उत्पन्न कर आगे पढ़ने को उत्सुक कर रहे हैं।

शिबु के अतीत का वो सुंदर किस्सा जिसमें नींबू, मिर्च संग मकई का स्वाद और सुधा संग प्रेम की मिठास है और वर्तमान का वो अजीब हिस्सा जिसमें विभु-विभु करती एक अंजान लड़की की मासूमियत और निश्छल प्रेम है जो खुद शिबु को विभु हो जाने पर मजबूर कर देती है ने बड़ी सहजता से पाठक को भी भावों में बाँध दिया।
वास्तव में हमने इसे बस पढ़ा नही बल्कि चलचित्र की भाँति आँखों के सामने घटते देखा है अतः हम यह कह सकते हैं कि इस कहानी का हर पाठक इसमें निहित भावों को जीते हुए इससे जुड़ गया होगा और यही इस कहानी की सार्थकता है।

आदरणीया अनीता दीदी जी अपनी  रचनाओं में संवेदनाओं का बड़ी सहजता और सुंदरता से प्रयोग करते हुए मानवीय मूल्यों को स्थापित करना बखूबी जानती हैं। इस कहानी ' ब्रोकेन फोन के तीन रहस्य ' में भी एक ब्रोकेन फोन से जुड़े दो किरदार विभु और शिबु को निमित्त बनाकर मानव चरित्र के सुंदर गुण प्रेम और करुणा की सुंदर झलक देते हुए अपने लेखिका होने के धर्म का बखूबी निर्वाह किया है।

बतौर लेखिका आदरणीया अनीता दीदी जी जहाँ विभु की माँ के रूप में एक माँ और पत्नी की अपने बेटे और पति के प्रति चिंता और हर परिस्थिति में घर-परिवार को संभाल कर रख सकने की एक नारी की सार्थक क्षमता को दर्शाती हैं। तो वहीं  आधुनिक युग में फेसबुक वगेरह पर हो जाने वाले प्रेम प्रसंग का भी सुंदर वर्णन कर रही हैं।

बड़े करीने से जब तीसरे वॉयस मेसेज में एक बच्चे की अपने सड़क दुर्घटना में घायल पिता के प्रति व्याकुलता  को प्रस्तुत किया तब मनुज्ता के गिरते स्तर को प्रस्तुत करते हुए यह भी दर्शाया कि किस तरह आज लोग सहायता के लिए आगे आने से हिचकिचाते हैं किंतु किसी को परेशानी में देख मोबाइल उठा वीडियो बनाने लगते हैं। वही दूसरी ओर कुछ अंग्रेजी शब्दों और गूगल सर्च का जिक्र आधुनिक युग के पाठकों के लिए कहानी को और भी रोचक बना रहा।

कहानी के शीर्षक मात्र से इसे पढ़ने की उत्सुकता बढ़ गयी थी और जैसे जैसे कहानी पढ़ते गए जिज्ञासा बढ़ती गयी। जितना सुंदर कहानी का आरंभ उतना ही रोचक इसका अंत भी है। यदि देखा जाए तो इस कहानी में मुख्य भूमिका में 'ब्रोकेन फोन ' ही है जिसने एक दिन में ही शिबु को विभु की ज़िंदगी सौंप दी।

इस कहानी अब हम और क्या ही सराहना करें? बस आदरणीया दीदी जी की कल्पना शक्ति और दीदी जी के कलम की रचनात्मकता को नमन कर सकती हूँ। साथ ही इस सुंदर और रोचक कहानी हेतु आदरणीया दीदी जी को ढेरों शुभकामनाओं संग हार्दिक बधाई देती हूँ।
सादर प्रणाम 🙏
- आँचल