बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Monday, 15 March 2021

कुछ लिखें ऐसा जो सवेरा करे

 


लफ़्ज होठों पे आकर थम से गए थे,

भाव मन में कहीं ठिठक से गए थे,

खुद को भी हम रोज़ भुलाने लगे थे,

ए कलम तुझसे यूँ जुदा जो हुए थे।


एक अरसे से तुमसे मिलीं जो नही,

सवेरा भी तबसे हुआ ही नही,

आओ मिलकर हम फिर से अंधेरा हरें,

कुछ लिखें ऐसा जो सवेरा करे।


पीर स्वयं की भुलाकर जहाँ की लिखें,

वासना को तजें, साधना हम करें,

मन स्याही से जब कागज़ को रंगे,

सृजन ऐसा हो जो मंगल करे।


कभी चुपके से गिरधर को पाती लिखें,

कभी बाबुल के आँगन की माटी लिखें,

जो लिखें पद तो गुरु-पद की अर्चना हो,

छंद-छंद में तिरंगे की वंदना हो।


आओ बीते पहर के नग़्मे लिखें,

कुछ भावी सहर के सपने लिखें,

क्रांति का ऐसा कोई मंत्र लिखें,

मृत संभावना को जीवंत लिखें।


तृण को सारा संसार लिखें,

रण को नव शृंगार लिखें,

साँसों के अंतिम फेरे में 

युग का नव आरंभ लिखें।


साँसों के अंतिम फेरे में 

युग का नव आरंभ लिखें।


#आँचल 

Sunday, 27 December 2020

है फिर भी ये कैसी लगन तुमसे कान्हा?

 


वो कभी प्रेम से चूमे गए,

कभी आँसुओं में भीगे ख़त ,

वो सूखे गुलाब जिनमें 

ताज़ा है इश्क की महक,

वो तुम्हारे साथ खिंचवाई तस्वीरें 

वो नोक-झोक,वो दलीलें,

वो तुमसे रूठ के जाना 

और तेरा आकर मनाना,

वो हाथों में हाथ थाम 

मीलों टहलना,

वो तेरे फोन के इंतज़ार में 

दिनभर तड़पना,

और छुपकर तुमसे 

सारी रात बतियाना,

वो मेरी नादानियों पर 

तुम्हारा भड़कना,

परवाह में मेरी रातों को जगना,

वो कंधे पर तेरे 

मेरा सर रखकर सोना,

ये कुछ भी तो नही 

मेरे पास ओ कान्हा,

है फिर भी ये कैसी लगन तुमसे कान्हा?

है फिर भी ये कैसी लगन तुमसे कान्हा?

#आँचल 

Tuesday, 22 December 2020

बिन प्रयास न होगा अब प्रभात


ध-धू करके जल रही आग,
सुख-स्वप्न हुए जन के सब खाक,
उठ रहा घोर चहुँ ओर चीत्कार,
सुनता न कोई यह दारुण पुकार,

घनघोर घिरा है जो अंधियार 
बिन प्रयास न होगा अब प्रभात।

कर मर्यादाएँ सब छार-छार 
सौ झूठ पर जो ठनी रार,
हुआ सत्य पर फिर प्रहार
और सरदार हुए सारे मक्कार,

तब लगा रही भारती गुहार 
बिन प्रयास न होगा अब प्रभात।

जो संकट में राष्ट्र को जान के,
सो रहे हैं चादर तान के,
कोई डालो निद्रा में व्यवधान,
और जागरण का करो शंखनाद,

हो जाओ अब रण को तैयार,
बिन प्रयास न होगा अब प्रभात।

हे रणभूमि में मौन खड़े 
कविवर क्यों रण से विमुख हुए?
जब लूटे दिनकर को व्यभिचार 
निकालो तुम भी तरकश से बाण,

और जला लो क्रांति की मशाल 
बिन प्रयास न होगा अब प्रभात।

हो एकमत एक प्राण बनो,
अधिकारों पर अपने अधिकार करो,
संक्रांत का तत्क्षण दान करो,
हो स्वयं दीप्त प्रकाश करो,

तब होगा तम का पूर्ण विनाश,
बिन प्रयास न होगा अब प्रभात,
बिन प्रयास न होगा अब प्रभात।

#आँचल 

Saturday, 31 October 2020

शाही दावत का न्योता

 


https://youtu.be/c0jPEvMUDWA

आओ बच्चों सुनो कहानी,

शेर खान की हो रही शादी!

डुगडुगी बजाकर भालू ने 

शाही संदेश सुनाया है,

शाही दावत का न्योता 

राजा ने सबको भेजवाया है।

होंगे दावत में शाही पकवान,

केसर-कुल्फी,बंगाली मिष्ठान,

चाट,कचौड़ी,चटनी तीखी,

दही- बड़े और रबड़ी मीठी।

सुनकर यह संदेश सभी के 

मुँह में पानी आया है,

बिन कुछ सोचे-समझे सबने 

तत्क्षण न्योता स्वीकारा है।

पर वही खड़ा एक नटखट बंदर 

समझ गया था चाल सब झटपट,

न्योते के पीछे राजा ने 

कुछ तो जाल बिछाया है,

मत स्वीकार करो यह न्योता 

बंदर ने सबको चेताया है।

पर लालच ने हर ली थी 

कुछ ऐसे सबकी बुद्धि,

लाख जतन करके भी 

बंदर से ना सुलझी गुत्थी।

अब बंदर की सब बात भुलाकर 

शादी में चले सब बनठन कर,

जो पहुँचे सब शादी में तो 

न मंडप था न कोई वर था,

चारों ओर शेरों का जमघट 

और प्राणों पर संकट था।

न मानी क्यों बात बंदर की?

सब लाख बार पछताए,

लालच का फल पाकर 

सब घबराए-चिल्लाए।

सुनकर सबका शोर विकट 

बंदर जो था सतत सजग 

तत्क्षण आया चिल्लाकर

सब भागो प्राण बचाकर,

मोटे-तगड़े,मूँछों वाले

चार अहेरी आए हैं,

जो घूम रहे हैं जंगल में 

संग ढेरों हथियार लाए हैं।

बोल रहा था उनमें से एक कि 

अबतक चार को मारा है,

अबकी बार तो दस शेरों पर 

हमको घात लगाना है। 

बस इतना कहकर बंदर ने 

जो शेरों को भरमाया,

छोटी सी युक्ति के आगे 

शेरों का सर चकराया।

काँप गए सब थर-थर ऐसे 

भागे प्राण बचाकर,

इसीलिए कहते हैं बच्चों 

भुगतोगे लालच में आकर।


#आँचल 

Sunday, 18 October 2020

भाग्य का जो चढ़ा दिवाकर

 

अब खो गए वो जगमग तारे,

अंधेरी रातें बीती जिनके सहारे,

है भाग्य का जो चढ़ा दिवाकर,

डोलते- फिरते हैं भंवरे सारे।


क्या हुए वो पत्थर सब एक किनारे?

मैं बढ़ा था जिनकी ठोकर के सहारे,

अब राह में मेरे फूल बिछाकर 

कर रहें हैं स्वागत किस स्वार्थ के मारे?


आगे फैले थे जिनके कल हाथ हमारे,

आज खड़े हैं आकर वो द्वार हमारे।

जो देखा पलभर को पीछे मुड़कर,

पाया फिर खुद को हाथ पसारे।


#आँचल 

Sunday, 26 July 2020

ए सभी देश के धीश सुनो



ए सभी देश के धीश सुनो,
नापाक पाक और चीन सुनो,
हम माटी के रखवाले हैं,
कारगिल के वही मतवाले हैं,
जिसने फ़तह की तारीख़ों को 
लहू से लिखना जाना है,
जिसके भुजबल का लोहा 
तीनों काल ने माना है,
जिसके शौर्य और सेना का 
दूजा न कोई सानी है,
चढ़ता सूरज भी जिसको नमन करे
हम रणधीर वही अभिमानी हैं,
हम वंशज मनोज और बत्रा के
सब बिखरे हमसे टकरा के,
हम निश्चित शांति-पुजारी हैं
पर समर-गीत के आशीक भी,
हमे हलके में लेना पड़ेगा भारी 
है चेतावनी यही आख़िरी हमारी,
जो आँख उठाकर तुमने देखा 
तो हमने भी भृकुटी तानी है,
तेरी एक हिमाकत और 
हमारी शमशीर पे गर्दन तुम्हारी है।
#आँचल 
#कारगिल_विजय_दिवस 

Sunday, 21 June 2020

योग द्वारा मानव विकास


मनुष्य का यह तन ईश्वर का वह अद्भुत वरदान है जिसे हम #योग द्वारा और निखार सकते हैं। योग न केवल हमे तन से अपितु मन के भी समस्त रोगों से,विकार से लड़ने और उससे मुक्त होने की क्षमता प्रदान करता है। योग हमे हमारी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने योग्य भी बनाता है और हमे हर नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। निरंतर योगाभ्यास में तपते हुए हमारी यह क्षणभंगुर काया हमे माया मुक्त करके हमारी आत्मा से और आत्मा में लीन परमात्मा से भी मिलवाती है। अर्थात् योग मात्र तन का व्यायाम नही अपितु यह वह ज्ञान या यूँ कहें कि वह विज्ञान है जो मानव तन की समस्त शक्तियों को जागृत कर उसे अपने अंतर में पूरे ब्रह्मांड का दर्शन करवाते हुए उसी ब्रह्मांड में स्वयं का दर्शन करवाता है। अर्थात् योग हमे ध्यान के माध्यम से इस संसार का पूर्ण ज्ञान कराता है। निरंतर योगाभ्यास पंचतत्व से बने इस तन को प्रकृति से जोड़ता है और यही हमे समस्त सिद्धियों का धनी भी बनाता है। योगाभ्यास द्वारा अपनी सप्त कुंडलियों को जागृत कर हम अपने अंतर में उस परमशक्ति का परिचय पा सकते हैं जिसने इस पूरे संसार की रचना की है। वास्तव में यह संसार कोई चमत्कार नही अपितु योगविज्ञान द्वारा रचा गया है और यही इस संसार का पालन और संहार भी करता है। अर्थात् योग का मार्ग मानव के विकास का मार्ग है जिस पर चलकर मनुष्य स्वयं के साथ-साथ पूरी सृष्टि का विकास करता है। अफ़सोस इस बात का है कि आज मनुष्य योग-ध्यान के स्थान पर भोग-ध्यान की ओर बढ़ चला है। भोग के पीछे भागते हुए हम पतन की ओर आ गए और योग की महत्ता को भूल गए। आज योग को पुनः अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि यही वह साधन है जो मनुष्य को विकास का उचित मार्ग देगा।
#आँचल