Wednesday, 19 October 2022
मौन का ढोंग!
Thursday, 13 October 2022
माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ
ओ माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ,
जाग-जाग रतियाँ में सुबह सजाऊँ ।
ओ माई तेरी.....
ओ मैली ये चदरिया! कैसे छुड़ाऊँ?
छींट पड़े नफ़रत के कैसे मिटाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी,मैं हारी,
धो-धो चदरिया दागी मोरी साड़ी।
माई दागी साड़ी को कैसे छुपाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में .....
ओ लाँघी जो देहरी तो घर कैसे जाऊँ?
अटक-अटक भटकी,डग कैसे पाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी,मैं हारी,
ढो-ढो धरम,करम गठरी से हारी।
माई करम गठरी अब कैसे उठाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में .....
ओ फूटी रे हाँडी,कैसे-क्या पकाऊँ?
भीगी रे लकड़ियाँ,ताप कैसे पाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी मैं,हारी,
जेब पड़ी ठंडी,आग पेट में लागी।
माई ऐसी सर्दी में जी कैसे पाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में.....
ओ माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ,
जाग-जाग रतियाँ में सुबह सजाऊँ।
ओ माई तेरी.....
#आँचल
Friday, 7 October 2022
मड़ई के राम
Wednesday, 28 September 2022
रात बैठी दीये मैं जलाती रही
(यहाँ 'मैं' अर्थात लेखनी)
रात बैठी दीये मैं जलाती रही,
इस अमावस से रार निभाती रही,
बुझ चुकीं न्याय की जब मशालें सभी,
एक जुगनू से आस लगाती रही।
रात बैठी.........
चढ़ चुके थे हिंडोले विषय जब सभी,
सज चुके मानवी जब खिलौने सभी,
मेला झूठ का ठग ने लिया जब सजा,
मैं भी सत्य का ढोल बजाने लगी।
रात बैठी........
दामिनी नैन अंजन लगाने लगी,
रागिनी राग भैरव गाने लगी,
यामिनी से गले लग खिली जब कली,
मैं भी दिनकर को ढाँढ़स बँधाने लगी।
रात बैठी........
आँख से बहते पानी से छलने लगे,
लोग अंतिम कहानी पे हँसने लगे,
जब हिमालय भी थककर बिखरने लगा,
मैं भी पत्थर-सी सरिता बहाने लगी।
रात बैठी........
#आँचल
Friday, 16 September 2022
चोला झूठ का सच को ओढ़ा दीजिए
Friday, 19 August 2022
मैं अमरता की नहीं कोई प्यास लेकर आई हूँ
मोक्ष की,वरदान की न चाह लेकर आई हूँ,
मैं समर्पण भावना से,नेह के उल्लास से,
प्रीत की गागर लिए सागर के द्वार आई हूँ।
मैं अमरता की नहीं......
नृत्य-नूपुर राधिका के मैं न बाँधे आई हूँ,
मैं नहीं मीरा की वीणा साथ लेकर आई हूँ,
मैं नहीं हूँ सूर जो अंतर में तुझको पा सकूँ,
धूल हूँ,चरणों की तेरे धूल होने आई हूँ।
मैं अमरता की नहीं......
रंग है,न रूप है,न संग में कोई कोष है
मोह है,न क्षोभ है,न जग से कोई रोष है,
दोष है मेरा कि मैं उजली सुबह न हो सकी,
यामिनी से द्वंद्व में पर हार के न आई हूँ।
मैं अमरता की नहीं.....
संकल्प की अभिसारिका,कर्तव्य हेतु आई हूँ,
परिणय की अग्नि-शिखा को पार कर के आई हूँ,
ओढ़कर चूनर वैरागी प्रणय पथ पर आई हूँ,
शून्य हूँ, महाशून्य में अब लीन होने आई हूँ।
मैं अमरता की नहीं कोई प्यास लेकर आई हूँ,
मोक्ष की,वरदान की न चाह लेकर आई हूँ,
मैं अमरता की नहीं......
#आँचल
Thursday, 18 August 2022
मैं खंडित-अखंड भारत हूँ
मैं भारत थी,
अखंड भारत।
मेरी विविधता थी
मेरे गर्व का कारण,
मेरी संतान करती थी
सहृदयता को धारण,
कर्म जिसका पथ था
और था सत्य का बल
प्रेम-सौहार्द संग
था जो निश्छल।
अनेक होकर भी एक,
एकता का सूत्र प्यारा था।
मैं आज भी
भारत हूँ,
खंडित-अखंड भारत।
निरपराध मैं
अपनी ही संतान द्वारा
दंडित अखंड भारत।
ज़ात-धर्म पर मुझे बाँटा गया,
राग-द्वेष से पाटा गया,
मेरी गोद में खेलती अबोध संतान
को मौत के घाट उतारा गया!
मैं स्तब्ध खड़ी देखती रही
मेरी संतान की निर्ममता,
मेरे टुकड़े कर चिल्लाया गया-
"संकल्प हमारा देश की अखंडता।"
#आँचल