Sunday, 1 January 2023
बेचारा ' नव वर्ष '
Monday, 26 December 2022
स्वाभिमान की भूख
Thursday, 1 December 2022
सावधान!
Tuesday, 8 November 2022
यह कविता की बंजर शाला
कोरे पृष्ठों पर अंकित होती
प्रेम-सुमन-सी अक्षरमाला,
छंद-छंद कूके कोकिल और
छम-छम नाचे सुंदर बाला।
वह युग कब का बीत चुका है,
यह कविता की बंजर शाला।
यह कविता की बंजर शाला।
उतर रही है हिम शिखरों से
शुभ्र-ज्योत्सना कलकल सरिता,
डग-डग भू-जन पोषित हैं
चखकर ज्ञान-सुधा का प्याला।
वह युग कब का बीत चुका है
सुधा-पुंज अब उगले हाला।
यह कविता की बंजर शाला।
काट रही घनघोर तिमिर को
दो-धारी तलवार-सी तूलिका,
हो भानुसुता-सी उतर रही है
प्राची के उर में रश्मि-माला।
वह युग कब का बीत चुका है,
टूट गई अब रश्मि-माला।
यह कविता की बंजर शाला।
कोरे पृष्ठों पर अंकित होती
प्रेम-सुमन-सी अक्षरमाला,
वह युग कब का.......
यह कविता की बंजर शाला।
#आँचल
Wednesday, 19 October 2022
मौन का ढोंग!
Thursday, 13 October 2022
माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ
ओ माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ,
जाग-जाग रतियाँ में सुबह सजाऊँ ।
ओ माई तेरी.....
ओ मैली ये चदरिया! कैसे छुड़ाऊँ?
छींट पड़े नफ़रत के कैसे मिटाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी,मैं हारी,
धो-धो चदरिया दागी मोरी साड़ी।
माई दागी साड़ी को कैसे छुपाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में .....
ओ लाँघी जो देहरी तो घर कैसे जाऊँ?
अटक-अटक भटकी,डग कैसे पाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी,मैं हारी,
ढो-ढो धरम,करम गठरी से हारी।
माई करम गठरी अब कैसे उठाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में .....
ओ फूटी रे हाँडी,कैसे-क्या पकाऊँ?
भीगी रे लकड़ियाँ,ताप कैसे पाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी मैं,हारी,
जेब पड़ी ठंडी,आग पेट में लागी।
माई ऐसी सर्दी में जी कैसे पाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में.....
ओ माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ,
जाग-जाग रतियाँ में सुबह सजाऊँ।
ओ माई तेरी.....
#आँचल