बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Wednesday, 9 August 2023

कभी तो वो सावन भी आएगा

 


कभी तो वो सावन भी आएगा 

संदेसा हरि का जो संग लाएगा,

कभी तो ये बदरा से झरते मोती 

दिखायेंगे उसकी श्यामल ज्योति,

कभी तो ये व्याकुल चित्‌ भी मोरा 

नाचेगा जैसे नाचे ये मयूरा,

कभी तो मिलन की वो रुत आएगी 

जब विरह में तपती धरा भीगेगी 

और भावों से नीरस हृदय भी मोरा 

प्रेम की बरखा में भीगेगा पूरा 

आयेंगे तब वो प्रेम-बिहारी 

चरण-रज में जिनके रमा मन सखी री,

चरण-रज में जिनके रमा मन सखी री।


#आँचल 

Sunday, 23 July 2023

मेरा संकल्प

एक छत के नीचे,
चार दीवारों के बीच,
माता-पिता की दी हुई
ज़मीन पर खड़ी मैं 
कुछ खिड़कियों के सहारे 
थोड़ा-सा ही सही 
इस संसार को 
देखने-समझने को उत्सुक बाहर झाँक रही हूँ।

आह! यह क्या देख रही हूँ?
कहीं कोई शोर करके सो रहा है
तो कहीं कोई मौन रो रहा है,
कोई काट कर अपना ही पेट 
अपनी 'भूख' मिटा रहा है,
कोई नंगे पाँव ही दौड़ चला 
छालों को करा के चुप,
कोई वातानुकूलित गाड़ी में बैठा 
कहता है 'उफ़',
यह कैसा है बाज़ार सजा?
यहाँ सब कुछ तो बिक रहा!
धर्म से ईमान तक,
देह से कमान तक!

ओह! यह कैसा 
भयानक वीभत्स मंज़र है?
क्या यह कोई विकसित 
आधुनिक  जंगल है?
थोड़ा ही सही 
देखकर यह दृश्य 
कुछ विचलित हो गई हूँ।
परब्रह्म के समक्ष
करबद्ध संकल्प ले रही हूँ -
" एक दिन अपने ज्ञान
और अनुभव की वह ज़मीन 
विकसित करूँगी जहाँ खड़ी 
होकर इस शोक - विलाप के 
मंज़र को सुख-संतोष में परिणित करूँगी।"

बस इस संकल्पपूर्ति हेतु 
एक बार यह दरवाज़ा खोल लूँ 
और इस बार थोड़ा-सा नहीं,
देख-समझ लूँ यह पूरा संसार,
ताकि कोई टोक न सके 
कि तुमने देखा नहीं अभी 
पूरा संसार।

यह तो हुई कुछ बरस पूर्व की बात,
आज तो कुछ बदले-से हैं हालात।
तब नादान थी कुछ, 
आज थोड़ी सयानी जो हुई हूँ
है जो बाधा संकल्प में 
उसे भाँप रही हूँ।

कहीं ठिठक न जाएँ ये पाँव मेरे 
संबंधों के मोह में,
या कहीं बेड़ी न डाल दे 
मेरे पाँवों में यह समाज,
कहीं कोई स्वयं यह दरवाज़ा 
खोलकर न आ जाए 
और पहनाकर लाल चूड़ियाँ 
अपनी चौखट पार करवाए।

उफ़! तब क्या करूँगी मैं?
क्या मान लूँगी उस घर को 
अपना सीमित, सुखद संसार?
और क्या बन जाऊँगी 
अस्तित्वहीन-सी मैं एक ज़िंदा लाश?
और यहाँ इस दरवाज़े के भीतर 
यूँ ही छूट जाएगा 
मेरे अस्तित्व का कारण 
मेरा 'संकल्प'!

#आँचल 

Friday, 23 June 2023

है कोई जग में परब्रह्म से ऊँचा?

फूलों से पूछा,कलियों से पूछा,
धरती,गगन और त्रिभुवन से पूछा,
जब पूछा तो सारे जग से ही पूछा 
किंतु किसी को कोई हल ही न सूझा!
तब जाकर सीधे परब्रह्म से पूछा -
"क्या है कोई जग में आप से ऊँचा?"
प्रभु सुनकर फिर हँसकर बोले, सुनो!
है ज्ञात जो जग को वह रहस्य सुनो!
मुझसे भी ऊँचा है जग में कोई दूजा 
चरणों में जिनके मैं भी हूँ झुकता,
मुझसे भी पहले जो सुनते तुम्हारी,
मुझसे भी पहले जो गुनते तुम्हारी,
उनसे ही तुमने इस जग को है जाना,
उनसे ही तुमने मुझको भी पहचाना,
जब सोचोगी,समझोगी तभी यह पहेली,
बूझोगी तब तुम इसको अकेली।
यूँ कहकर प्रभु फिर मौन हुए,
परब्रह्म के बोल पर मन में रहे,
खूब,सोचा-विचारा पर हल जब न पाया 
तब माया ने भ्रम का जाल हटाया 
और ज्ञात-रहस्य से पर्दा उठाया,
फिर देखा जो!देखा बड़े अचरज से मैंने,
परब्रह्म से ऊँचा पद जिनका था पाया 
उन मात-पिता को फिर शीश नवाया।

#आँचल 

Tuesday, 13 June 2023

यामिनी


 यामिनी तो रोज़ चाँद-तारों 

की बारात लिए आती है,

पर यह दुनिया ही उसे

देख कर मुँह बनाती है 

और नींद का बहाना कर 

आँखें मूँद लेती है।

उसके उर में छुपी ममता,

प्रेम और शीतलता को 

केवल वही समझ पाता है 

जो रात भर उसके 

साथ जागता है,

उसे आँख भर निहारता है 

और वही इस रहस्य को 

भी जानता है कि 

'यामिनी' वह विरहिणी है 

जो सत्य की पहली किरण को 

अपना सर्वस्व समर्पित करने हेतु 

रात भर अंधकार से जूझती है।


#आँचल 

Thursday, 4 May 2023

त्राहिमाम! त्राहिमाम!

"त्राहिमाम! त्राहिमाम!"
हे राजन! जनता रही पुकार,
जंतर-मंतर से न्याय माँगती 
बेटियों की है यह गुहार,
दरबारी एक तुम्हारा 
उन पर करता अत्याचार,
श्रम पर जिनके मान बढ़ा है,
गौरव का आकाश घना है,
आज उन्ही के अश्रुजल में 
कहीं डूबे न सरकार,
त्राहिमाम! त्राहिमाम!
हे राजन! जनता रही पुकार।

सावधान! सावधान!
हे राजन! संकट में सरकार।
हो विवश शीश उठा न लें
वे,सजदे में अब तक जो 
झुकते थे,
हो विवश कहीं लौटा न दें
वे तमग़े जिनकी चमक में 
तुम भी चमके थे,
दामन अपना छुपा लो राजन 
कहीं लग न जाए दाग़,
खिलाड़ी तुम हो राजनीति के 
हैं ये भी दंगल के उस्ताद,
सावधान! सावधान!
हे राजन! कहीं मिले न धोबी-पछाड़।

Sunday, 9 April 2023

बदले पृष्ठ इतिहास के

बदले पृष्ठ इतिहास के 
हुआ काल पर घात 
राजा निर्भय कर रहा 
मनमानी-सी बात 
जनता को पुचकार के 
किया जो अपने साथ 
दुम हिलाए घूम रही 
भूल के हित की बात 
वर्तमान की नीतियाँ 
भावी युग का अंधकार 
जनता भी अब कर रही 
सहर्ष जिसे स्वीकार!
ख़ुद ही आँखें फोड़ लीं,
काटे जीभ और कान!
कैसा बुख़ार यह चढ़ रहा?
है कैसी यह सरकार?
क्यों ढक्कन बंद आक्रोश है 
जब चौपट है धन-धान्य?
जो राजा के चाकर बने 
क्यों सत्य उन्हीं का मान्य?
करुणा के भूषण त्याग कर 
यह कैसा धर्म प्रचार?
संस्कृतियों के घाट पर 
अब होता व्यभिचार!
यह कैसा ढोंग-प्रलाप है 
है कैसा यह संताप?
मोती आँखों के बेच कर 
सब चुगते मुक्ता-माल!
आज रचना है इतिहास जिन्हें 
वे सोते सेज सजाए 
और अभिमन्यु-सा सत्य खड़ा 
लहू से रहा नहाए।
लिख रहा है फिर से क्या कोई 
झूठ का गौरव इतिहास 
छल रहा यह देश को 
या कर रहा परिहास?
छल रहा यह देश को 
या कर रहा परिहास?
#आँचल 

Monday, 13 February 2023

सिर्फ़ इंसान नहीं बन सकते हैं

 हम स्त्री-पुरुष हो सकते हैं,

रूप-कुरूप हो सकते हैं,

छोटे-बड़े हो सकते हैं,

जातियों में बँट सकते हैं,

मज़हबों में रंग सकते हैं,

संपत्ति के नाम पर 

आपस में लड़ सकते हैं,

ज़मीर को अपने हम 

ताक पर रख सकते हैं,

प्रांत,वाद और पंथ आदि 

कितने ही पात्रों में ढलने 

की कला रखते हैं,

हम कुछ भी कर सकते हैं,

कुछ भी बन सकते हैं 

बस हम इंसान 

सिर्फ़ इंसान नहीं बन सकते हैं।


#आँचल