Thursday, 1 December 2022
सावधान!
Tuesday, 8 November 2022
यह कविता की बंजर शाला
कोरे पृष्ठों पर अंकित होती
प्रेम-सुमन-सी अक्षरमाला,
छंद-छंद कूके कोकिल और
छम-छम नाचे सुंदर बाला।
वह युग कब का बीत चुका है,
यह कविता की बंजर शाला।
यह कविता की बंजर शाला।
उतर रही है हिम शिखरों से
शुभ्र-ज्योत्सना कलकल सरिता,
डग-डग भू-जन पोषित हैं
चखकर ज्ञान-सुधा का प्याला।
वह युग कब का बीत चुका है
सुधा-पुंज अब उगले हाला।
यह कविता की बंजर शाला।
काट रही घनघोर तिमिर को
दो-धारी तलवार-सी तूलिका,
हो भानुसुता-सी उतर रही है
प्राची के उर में रश्मि-माला।
वह युग कब का बीत चुका है,
टूट गई अब रश्मि-माला।
यह कविता की बंजर शाला।
कोरे पृष्ठों पर अंकित होती
प्रेम-सुमन-सी अक्षरमाला,
वह युग कब का.......
यह कविता की बंजर शाला।
#आँचल
Wednesday, 19 October 2022
मौन का ढोंग!
Thursday, 13 October 2022
माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ
ओ माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ,
जाग-जाग रतियाँ में सुबह सजाऊँ ।
ओ माई तेरी.....
ओ मैली ये चदरिया! कैसे छुड़ाऊँ?
छींट पड़े नफ़रत के कैसे मिटाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी,मैं हारी,
धो-धो चदरिया दागी मोरी साड़ी।
माई दागी साड़ी को कैसे छुपाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में .....
ओ लाँघी जो देहरी तो घर कैसे जाऊँ?
अटक-अटक भटकी,डग कैसे पाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी,मैं हारी,
ढो-ढो धरम,करम गठरी से हारी।
माई करम गठरी अब कैसे उठाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में .....
ओ फूटी रे हाँडी,कैसे-क्या पकाऊँ?
भीगी रे लकड़ियाँ,ताप कैसे पाऊँ?
हाय रामा! हारी,हारी मैं,हारी,
जेब पड़ी ठंडी,आग पेट में लागी।
माई ऐसी सर्दी में जी कैसे पाऊँ?
जाग-जाग रतियाँ में.....
ओ माई तेरी काजल-सी ढिबरी को राखुँ,
जाग-जाग रतियाँ में सुबह सजाऊँ।
ओ माई तेरी.....
#आँचल
Friday, 7 October 2022
मड़ई के राम
Wednesday, 28 September 2022
रात बैठी दीये मैं जलाती रही
(यहाँ 'मैं' अर्थात लेखनी)
रात बैठी दीये मैं जलाती रही,
इस अमावस से रार निभाती रही,
बुझ चुकीं न्याय की जब मशालें सभी,
एक जुगनू से आस लगाती रही।
रात बैठी.........
चढ़ चुके थे हिंडोले विषय जब सभी,
सज चुके मानवी जब खिलौने सभी,
मेला झूठ का ठग ने लिया जब सजा,
मैं भी सत्य का ढोल बजाने लगी।
रात बैठी........
दामिनी नैन अंजन लगाने लगी,
रागिनी राग भैरव गाने लगी,
यामिनी से गले लग खिली जब कली,
मैं भी दिनकर को ढाँढ़स बँधाने लगी।
रात बैठी........
आँख से बहते पानी से छलने लगे,
लोग अंतिम कहानी पे हँसने लगे,
जब हिमालय भी थककर बिखरने लगा,
मैं भी पत्थर-सी सरिता बहाने लगी।
रात बैठी........
#आँचल