कुछ बातें बोली नही जाती तो वो अनकही हो जाती हैं उन अनकही बातों को इन पन्नों पर उतारा है।

Saturday, 9 June 2018

सच का ताबीज़

सूनी सी हो चली है
धर्म की दहलीज़
जबसे जमाने ने पायी
झूठ की ताबीज़
ओढ़ कर हिजाब बैठा
सच हुआ नाचीज़
बढ़ चला बेखौफ सा
फरेब का तासीर
बेच कर ईमान सारा
जग हुआ अमीर
देखकर दुख का नजारा
कह रहा आमीन
लूट कर खाना हुआ है
आज की तहज़ीब
बाँट कर खाना कहाँ अब
होता है लज़ीज़ 
नफरतो को पालना
जिसकी है तमीज़
कर रहा ढकोसला
बनकर वो फ़क़ीर
दया,धर्म ये भावरत्न
अब होते नही नसीब
इंसानियत को मारके जबसे
अधर्म हुआ रईस
पर भूल मत दस्तूर उसका
जो लिखता है तक़दीर
अधर्म की हर बरकत के आगे भी
होगी बस धर्म की जीत
बदनसीब होगी फ़िर से
झूठ की लकीर
बाँधेगा ज़माना फ़िर से
सच का वही ताबीज़
                               #आँचल

15 comments:

  1. जमाने का सही सही खांचा खींच दिया आंचल आपकी कविता ने यथार्थ का चित्रण ।
    सचमुच यही हाल है जमाने कि बहुत सामायिक कविता

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय दीदी जी
      बस कोशिश थी आपकी सराहना ने सार्थक कर दी
      आप सदा ही अपनी टिप्पणी द्वारा हमारा उत्साह बढ़ाती है
      हार्दिक आभार सादर नमन शुभ दिवस 🙇

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  2. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः ......!और
    बाँधेगा ज़माना फ़िर से
    सच का वही ताबीज़!
    बहुत सार्थक प्रस्तुति!! बधाई और आभार!!!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सर
      लिखने के बाद जब रचना पुनः पढ़ी हमने तो हमे भी गीता की यही पंक्तिया याद आयी थी
      आपकी टिप्पणी से रचना का मान बढ़ गया हार्दिक आभार
      सादर नमन शुभ दिवस

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (11-06-2018) को "रखना कभी न खोट" (चर्चा अंक-2998) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय
      सादर नमन शुभ दिवस

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक ११ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद दीदी जी
      हम बेशक उपस्थिति होंगे
      सादर नमन शुभ दिवस

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  5. क्या बात है.. अद्भुत प्रस्तुतीकरण

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद दीदी जी आपकी इस मनमोहक टिप्पणी के लिए

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  6. वाह!!सखि ...आँचल जी ,बहुत ही खूबसूरत यथार्थ चित्रण।

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय शुभा जी अपनी मनमोहक टिप्पणी से हमारी रचना का मान बढ़ा दिया आपने
      सादर नमन शुभ संध्या

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  7. बहुत सुंदर रचना। ऐसी रचनाएं कभी कभी पढने को मिलती हैं...आँचल जी
    वक़्त मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आयें|
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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    1. जी बिलकुल आऊँगी आदरणीय
      सराहना हेतु हार्दिक आभार
      सादर नमन शुभ दिवस

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  8. बहुत सुंदर रचना। सच के ताबीज़ के मायने बहुत सटीक तौर पर उभर कर आये हैं आपकी रचना में। अद्भुत लेखन।
    शुभकामनाएं
    सादर

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