बस यही प्रयास कि लिखती रहूँ मनोरंजन नहीं आत्म रंजन के लिए

Sunday, 1 October 2023

पिता की भूमिका में एक भाई

एक पुरुष अपने सर्वोत्तम रूप में होता है 
जब वह एक पिता की भूमिका में होता है,
भूख,प्यास,थकान से कुछ ऊपर होता है,
अपनी संतान के जीवन में सुख के हर रंग भरने को 
विपरीत परिस्थितियों में भी तत्पर रहता है।
कल देखा है मैंने एक ऐसे ही पुरुष को 
जिसके माथे पर ढुलकी गंग-स्वेद बिंदु 
दमकती चिंताओं का अभिषेक कर रहीं थी
और बता रही थी सबको कि
वात्सल्य का भाव जगत में सबसे सुंदर होता है,
पिता की भूमिका में एक भाई 
पिता से बढ़कर होता है।

#आँचल

Saturday, 30 September 2023

षड्यंत्रों के आगे भविष्य के सूरज को डूबे देखा है,
फैले हुए इन हाथों में लुक-छुप करती रेखा है,
इन नन्ही-नन्ही आँखों में रंगों को 
मरते देखा है,
क्यों माँओं को भी इनके इनका स्वप्न मारते देखा है।
#आँचल 


Saturday, 9 September 2023

देहवास का मिला है श्राप

सोच रही हूँ क्यों
निश्छल,निष्पाप आत्माओं को 
देहवास का मिला है श्राप?
विकारों की मलिनता,
छल,प्रपंच और भीरूता
ढोंग भरा अनुराग!
हाय!मनु-संग है संताप
किस अपराध का है यह त्रास?
देहवास का मिला है श्राप।
#आँचल

Monday, 4 September 2023

मैं सजनी बनी श्याम पिया की

 


मैं सजनी बनी श्याम पिया की

अद्भुत कर शृंगार चली

मैं सजनी बनी श्याम पिया की।

प्रीत-डगर पे चलते-चलते 

झाँझर रीत की तोड़ चली

छूट गई माया कंचन की 

वैराग्य की चूनर ओढ़ चली

पंच-रत्न की सजा के वेदी 

सप्त-भुवन को लाँघ चली 

मैं सजनी बनी श्याम पिया की 

अद्भुत कर शृंगार चली।


#आँचल 


Wednesday, 9 August 2023

कभी तो वो सावन भी आएगा

 


कभी तो वो सावन भी आएगा 

संदेसा हरि का जो संग लाएगा,

कभी तो ये बदरा से झरते मोती 

दिखायेंगे उसकी श्यामल ज्योति,

कभी तो ये व्याकुल चित्‌ भी मोरा 

नाचेगा जैसे नाचे ये मयूरा,

कभी तो मिलन की वो रुत आएगी 

जब विरह में तपती धरा भीगेगी 

और भावों से नीरस हृदय भी मोरा 

प्रेम की बरखा में भीगेगा पूरा 

आयेंगे तब वो प्रेम-बिहारी 

चरण-रज में जिनके रमा मन सखी री,

चरण-रज में जिनके रमा मन सखी री।


#आँचल 

Sunday, 23 July 2023

मेरा संकल्प

एक छत के नीचे,
चार दीवारों के बीच,
माता-पिता की दी हुई
ज़मीन पर खड़ी मैं 
कुछ खिड़कियों के सहारे 
थोड़ा-सा ही सही 
इस संसार को 
देखने-समझने को उत्सुक बाहर झाँक रही हूँ।

आह! यह क्या देख रही हूँ?
कहीं कोई शोर करके सो रहा है
तो कहीं कोई मौन रो रहा है,
कोई काट कर अपना ही पेट 
अपनी 'भूख' मिटा रहा है,
कोई नंगे पाँव ही दौड़ चला 
छालों को करा के चुप,
कोई वातानुकूलित गाड़ी में बैठा 
कहता है 'उफ़',
यह कैसा है बाज़ार सजा?
यहाँ सब कुछ तो बिक रहा!
धर्म से ईमान तक,
देह से कमान तक!

ओह! यह कैसा 
भयानक वीभत्स मंज़र है?
क्या यह कोई विकसित 
आधुनिक  जंगल है?
थोड़ा ही सही 
देखकर यह दृश्य 
कुछ विचलित हो गई हूँ।
परब्रह्म के समक्ष
करबद्ध संकल्प ले रही हूँ -
" एक दिन अपने ज्ञान
और अनुभव की वह ज़मीन 
विकसित करूँगी जहाँ खड़ी 
होकर इस शोक - विलाप के 
मंज़र को सुख-संतोष में परिणित करूँगी।"

बस इस संकल्पपूर्ति हेतु 
एक बार यह दरवाज़ा खोल लूँ 
और इस बार थोड़ा-सा नहीं,
देख-समझ लूँ यह पूरा संसार,
ताकि कोई टोक न सके 
कि तुमने देखा नहीं अभी 
पूरा संसार।

यह तो हुई कुछ बरस पूर्व की बात,
आज तो कुछ बदले-से हैं हालात।
तब नादान थी कुछ, 
आज थोड़ी सयानी जो हुई हूँ
है जो बाधा संकल्प में 
उसे भाँप रही हूँ।

कहीं ठिठक न जाएँ ये पाँव मेरे 
संबंधों के मोह में,
या कहीं बेड़ी न डाल दे 
मेरे पाँवों में यह समाज,
कहीं कोई स्वयं यह दरवाज़ा 
खोलकर न आ जाए 
और पहनाकर लाल चूड़ियाँ 
अपनी चौखट पार करवाए।

उफ़! तब क्या करूँगी मैं?
क्या मान लूँगी उस घर को 
अपना सीमित, सुखद संसार?
और क्या बन जाऊँगी 
अस्तित्वहीन-सी मैं एक ज़िंदा लाश?
और यहाँ इस दरवाज़े के भीतर 
यूँ ही छूट जाएगा 
मेरे अस्तित्व का कारण 
मेरा 'संकल्प'!

#आँचल