प्रिय रजनी,
तुम्हें याद है कि कैसे
कभी घोर विषाद में जब
ढूँढती कोइ प्रकाश
या देख लेती एक बार आकाश
या बस यूँ ही करनी होती
तुमसे दिल की दो बात
तो मैं लिख भेजती तुम्हें
कितने ही तार!
पर इधर जाने क्यों
मन के घुप अँधेरे को
लाख टटोला
पर कुछ मिला ही नहीं
जो तुम्हें लिख भेजूँ!
पर मेरी यामिनी
तुम अब भी हो मुझे याद
और मैं फिर लिखुँगी तुम्हें
पहले की तरह ढेरों तार,
जैसे लिखा है आज!
तुम्हारी ही शांत-शीतल
गोद में बैठे-बैठे।
#आँचल
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 18 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
वाह
ReplyDeleteबेहतरीन पंक्तियाँ
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