सर पे सूरज चढ़ चुका है
ताप मौसम का बढ़ चुका है
तर बतर तन गर्मी से
ना कटता तरु अब कुल्हाड़ी से
अब थोड़ा सा विश्राम करूँगा
पेड़ के नीचे एक नींद भरूँगा
ज्यों बैठा मै छाँव तले
आँखों में गहरी थकान भरे
कोई क्रंदन कानों में गूँज उठा
और लगा समा नाराज़ हुआ
चू चू करती जैसे कोई
नन्ही चिड़िया रोती हो
बेघर होने के डर से
रहम रहम चिल्लाती हो
शोर मचाती जैसे कोई
वानर टोली घबराई हो
इधर उधर से कूद फाँदकर
मदद की आस लगायी हो
सरपट सरपट वो भाग रही
गिलहरी भी सहमी सी लगती है
दानव दानव की गाली देकर
जाने किधर भटकती है
फुफकारता निकला फ़िर एक भुजंग
जैसे नींद में पड़ा गया हो भंग
अब तो मै भी सकपका गया
देखकर सब कुछ घबरा गया
तभी तेज़ हवा का झोंका आया
आलम बदला सा मैंने पाया
अब कहीं नही हरियाली है
पेड़ों से दुनिया खाली है
ये कैसा धरा ने रूप धरा
जीवन धरती पर घुटन भरा
नदियाँ भी जैसे प्यासी हो
सब साँसें गिनती में चलती हो
कहीं बंजर भूमि है तप रही
कहीं बाड़ में दुनिया डूब रही
कोने कोने में अकाल पड़ा
हर घर मृत्यु का काल खड़ा
देख भय से मन ये काँप गया
मै कैसे यहाँ तक पहुँच गया
क्या धरती को किसी ने श्राप दिया
ये किसने सुकून का क़त्ल किया
तभी फ़िर से जोर की चली हवा
उसी पेड़ की छाँव में मैं फ़िर से खड़ा
यकायक दिल को जो सुकून मिला
खुशी में पेड़ को चूम लिया
तभी भावविभोर हो पेड़ भी बोला
उसी ने किया ये सब कुछ इस राज़ को खोला
ये चिड़िया,वानर,भुजंग,गिलहरी
सब पनाह लेती मुझमें हर पहरी
जाने कितने जीवों का घर बार हूँ मै
तेरी साँसों का भी आधार हूँ मै
जो दृश्य भयंकर देखा है तुमने
बिन मेरे वही मंजर पाओगे
जो काटोगे पेड़ों को ऐसे
तो जीवन को कैसे पाओगे
यही बताने तुझको समझाने
कुदरत ने था सब स्वाँग रचा
बिन पेड़ों के बिन वृक्षों के
तू कैसे लेगा साँस बता
सुनकर मै था स्तब्ध खड़ा
पर मजबूर मै भी अब बोल पड़ा
तुम से ही मेरी रोजी रोटी
तुम से ही पूँजी होती है
जो ना काटूँगा एक दिन तुझको
तो बिटिया भूखी मेरी भी सोती है
और मै ही एक ज़िम्मेदार नही
कसूर बाकी सबका भी कम तो नही
मैं अकेले कैसे जीवन को बचाऊँगा
बिन काटे कैसे घर को जाऊँगा
बोला पेड़ तेरी बात है सही
पर मुश्किल का तेरे है हल भी यही
जो एक पेड़ को काटो तो दो पहले ही लगा देना
एक के बदले दो देकर धरती पर जीवन बचा लेना
तभी गर्म हवा का झोंका आया
नींद से उसने मुझे जगाया
वृक्षों से धरा ने जीवन पाया
ख्वाब ने मुझे ये राज़ बताया
अब पहले दो पेड़ लगाऊँगा
तभी काटने का हक़ भी पाऊँगा
#आँचल
ताप मौसम का बढ़ चुका है
तर बतर तन गर्मी से
ना कटता तरु अब कुल्हाड़ी से
अब थोड़ा सा विश्राम करूँगा
पेड़ के नीचे एक नींद भरूँगा
ज्यों बैठा मै छाँव तले
आँखों में गहरी थकान भरे
कोई क्रंदन कानों में गूँज उठा
और लगा समा नाराज़ हुआ
चू चू करती जैसे कोई
नन्ही चिड़िया रोती हो
बेघर होने के डर से
रहम रहम चिल्लाती हो
शोर मचाती जैसे कोई
वानर टोली घबराई हो
इधर उधर से कूद फाँदकर
मदद की आस लगायी हो
सरपट सरपट वो भाग रही
गिलहरी भी सहमी सी लगती है
दानव दानव की गाली देकर
जाने किधर भटकती है
फुफकारता निकला फ़िर एक भुजंग
जैसे नींद में पड़ा गया हो भंग
अब तो मै भी सकपका गया
देखकर सब कुछ घबरा गया
तभी तेज़ हवा का झोंका आया
आलम बदला सा मैंने पाया
अब कहीं नही हरियाली है
पेड़ों से दुनिया खाली है
ये कैसा धरा ने रूप धरा
जीवन धरती पर घुटन भरा
नदियाँ भी जैसे प्यासी हो
सब साँसें गिनती में चलती हो
कहीं बंजर भूमि है तप रही
कहीं बाड़ में दुनिया डूब रही
कोने कोने में अकाल पड़ा
हर घर मृत्यु का काल खड़ा
देख भय से मन ये काँप गया
मै कैसे यहाँ तक पहुँच गया
क्या धरती को किसी ने श्राप दिया
ये किसने सुकून का क़त्ल किया
तभी फ़िर से जोर की चली हवा
उसी पेड़ की छाँव में मैं फ़िर से खड़ा
यकायक दिल को जो सुकून मिला
खुशी में पेड़ को चूम लिया
तभी भावविभोर हो पेड़ भी बोला
उसी ने किया ये सब कुछ इस राज़ को खोला
ये चिड़िया,वानर,भुजंग,गिलहरी
सब पनाह लेती मुझमें हर पहरी
जाने कितने जीवों का घर बार हूँ मै
तेरी साँसों का भी आधार हूँ मै
जो दृश्य भयंकर देखा है तुमने
बिन मेरे वही मंजर पाओगे
जो काटोगे पेड़ों को ऐसे
तो जीवन को कैसे पाओगे
यही बताने तुझको समझाने
कुदरत ने था सब स्वाँग रचा
बिन पेड़ों के बिन वृक्षों के
तू कैसे लेगा साँस बता
सुनकर मै था स्तब्ध खड़ा
पर मजबूर मै भी अब बोल पड़ा
तुम से ही मेरी रोजी रोटी
तुम से ही पूँजी होती है
जो ना काटूँगा एक दिन तुझको
तो बिटिया भूखी मेरी भी सोती है
और मै ही एक ज़िम्मेदार नही
कसूर बाकी सबका भी कम तो नही
मैं अकेले कैसे जीवन को बचाऊँगा
बिन काटे कैसे घर को जाऊँगा
बोला पेड़ तेरी बात है सही
पर मुश्किल का तेरे है हल भी यही
जो एक पेड़ को काटो तो दो पहले ही लगा देना
एक के बदले दो देकर धरती पर जीवन बचा लेना
तभी गर्म हवा का झोंका आया
नींद से उसने मुझे जगाया
वृक्षों से धरा ने जीवन पाया
ख्वाब ने मुझे ये राज़ बताया
अब पहले दो पेड़ लगाऊँगा
तभी काटने का हक़ भी पाऊँगा
#आँचल
जी नमस्ते,
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक २१ मई २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय श्वेता दीदी
Deleteहम अवश्य आयेंगे
सादर नमन
शुभ दिवस 🙇
हार्दिक आभार आदरणीय शास्त्री जी
ReplyDeleteसादर नमन
शुभ दिवस
आंचल लाजवाब आपने एक सपने के माध्यम से भविष्य और वर्तमान का एक सुंदर संदेशात्मक ताना बाना बुन कर अप्रतिम काव्य का सृजन किया।
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर और सार्थक।
बखूबी समझती हैं आप हमारी रचना को कुसुम दीदी
Deleteयही कोशिश थी हमारी की उस भयंकर भविष्य की झलक अपनी रचना के ज़रिये दिखा सकूँ जिसकी ओर वर्तमान में हमारे कदम बढ़ रहे हैं
आपको पसंद आयी लिखना सार्थक हुआ
हार्दिक आभार सादर नमन 🙇
अति सुन्दर
ReplyDeletethank you so much Sunil bhaiya 🙇
Deleteप्रिय आँचल सीधे सादे शब्दों में अत्यंत गंभीर बात कह गईं आप.... पिछले दो तीन दिनों में पेड़ के चित्र से संबंधित कई रचनाएँ पढ़ीं। इतना कह सकती हूँ कि इस रचना के माध्यम से आपने जो चित्र खींच दिया वह आपकी रचना को दूसरों से अलग एवं विशेष बनाता है। बहुत सा स्नेह आपके लिए....
ReplyDeleteआदरणीया मीना जी प्रत्युत्तर में देरी के लिए क्षमा
Deleteहमने तो बस कोशिश की थी अपने भावों को शब्दों में पिरोने की और आपने हमारी कोशिश का इतना मान बढ़ा दिया हार्दिक आभार ऐसे ही अपना स्नेह आशीष बनाए रखिएगा
सुप्रभात शुभ दिवस 🙇
जो एक पेड़ को काटो तो दो पहले ही लगा देना
ReplyDeleteएक के बदले दो देकर धरती पर जीवन बचा लेना
बहुत सुन्दर, सार्थक एवं लाजवाब....
वाह!!!
हार्दिक आभार आदरणीया सुधा जी
Deleteजितनी तेज़ी से पेड़ से धरती खाली हो रही है उतनी ही तेज़ी से धरती फ़िर हरी भरी हो जाए इसी इच्छा को लेकर ये संदेश दिया है हमने आपको पसंद आयी हार्दिक आभार सुप्रभात शुभ दिवस 🙇
हमारी रचना को चुनने के लिए हार्दिक आभार 🙇
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर प्रस्तुति :)
ReplyDeleteबहुत दिनों बाद आना हुआ ब्लॉग पर प्रणाम स्वीकार करें
हार्दिक आभार आपका आदरणीय
Deleteहमारे blog पर आपका पुनः स्वागत है
सादर नमन शुभ दिवस
सुंदर रचना.....लिखते रहें।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय
Deleteblog पर आपका स्वागत है
सादर नमन शुभ दिवस